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उलझन - हमारे जीवन को बहुत अधिक आसान बनाने वाले टेक टूल्स के बीच हम अपनी बुद्धि को शिथिल होने से कैसे बचा सकते हैं?

 सुलझन

थोड़े समय पहले हमें बहुत सारे फ़ोन नंबर याद थे। बचपन में रटे पहाड़े भी हमें याद थे और छोटा-मोटा हिसाबा-किताब हम जुबानी कर लेते थे। अब सारे नंबर मोबाइल में रहते हैं। मोबाइल में उपलब्ध कैल्कुलेटर और अन्य अनेक सुविधाएँ धीरे-धीरे हमें उन क्षमताओं और दक्षताओं से दूर करती जा रही है जो मानव सभ्यता ने लाखों वर्षों की विकास-यात्रा में बड़ी कठिनाइयों से अर्जित की हैं। हमें यह विचार करना चाहिए कि हम किस धरोहर को खो रहे हैं। 

सबसे बड़ा संकट भाषाओं पर है। भाषा का उद्भव समाज में प्रचलन से होता है और समय के साथ एक बड़ी यात्रा तय करते हुए वह परिमार्जित रूप लेकर किताबों तक पहुँचती है। शब्दों का शुद्ध रूप क्या है, वाक्य किस तरह बनाए जाएँ, किस तरह हम अपनी बात कहें कि वह प्रभावी हो, साथ ही त्रुटिहीन भी हो, ये सब बातें हम समय के साथ सीखते हैं और हमारे व्यवहार से भाषा और सुदृढ़ होती है। तकनीक के बढ़ते प्रभाव के चलते युवा सही वर्तनी (spelling) लिखना ज़रूरी नहीं समझते, संकेतों और स्माइलीज़ का बहुत अधिक उपयोग करने लगे हैं और निबंध आदि भी चैटजीपीटी जैसे आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस टूल की मदद से लिखने लगे हैं। अगर उनसे कहें कि किसी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए 3 वाक्य लिखें तो वे 3 वाक्य भी नहीं लिख पाएँगे। इसकी जगह HBD और केक की स्माइली लगा देंगे।  

नएपन का स्वागत होना चाहिए। स्माइली आदि लगा देने से संदेश और अच्छे लगने लगते हैं लेकिन भाषा का उपयोग करके अपनी भावना व्यक्त करना, किसी घटना का ऐसा सजीव वर्णन करना कि सुननेवाला मंत्रमुग्ध हो जाए, यह कौशल हमने सदियों के प्रयासों से हासिल किया है। इस कौशल का उत्कृष्टतम रूप हमारे साहित्य में देखा जा सकता है। हमारे ग्रंथ, चाहे वे वेद हों, कालिदास के नाटक हों, रामचरितमानस जैसे लोक में प्रचलित ग्रंथ या दुनिया की किसी भी भाषा की क्लासिक कृतियाँ, वे हमारी सबसे महत्वपूर्ण धरोहर हैं। ये ग्रंथ भावी पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तंभ का कार्य करते हैं। अर्जित भाषा के बल पर हम मनुष्य को पशु बनने से रोक सकते हैं। इसलिए, भाषा अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। अगर हमारे पास किसी की तारीफ़ करने के लिए, किसी बात की आलोचना के लिए शब्द न हों, हम अपनी बात ठीक से न रख पाएँ तो हम स्वयं को कितना गरीब महसूस करेंगे? प्रायः मैंने देखा है कि जब लोग ठीक से अपनी बात नहीं रख पाते तो गालियों पर उतर जाते हैं। वे समझा नहीं पा रहे हैं तो गालियाँ बोलकर या हाथापाई करके दूसरों पर हावी होने की कोशिश करते हैं। ये पूरी तरह से पशुओं के लक्षण हैं। भाषा और अभिव्यक्ति मनुष्य होने की आवश्यक शर्त है। हमें तकनीक का उपयोग भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए करना चाहिए और ऐसे शॉर्ट कट से बचना चाहिए जिनसे भाषा का प्रचलन कम हो।  

जब जीवन में तकनीक का प्रयोग अधिक नहीं था, उस समय लोग अपने दैनिक काम-काज में जितना शारीरिक श्रम करते थे, उससे उनका व्यायाम हो जाता था। अधिकांश को अलग से वर्जिश करने की आवश्यकता नहीं थी। अब यह स्थिति है कि अगर आप स्वस्थ रहने का संकल्प लेते हैं तो आपको मॉर्निंग-इवनिंग वॉक, जिम, स्वीमिंग, जॉगिंग, योग आदि न जाने क्या-क्या करना पड़े। मेधाशक्ति को धार देने के लिए भी ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा। पढ़ने-लिखने के लिए, लोगों से बातें करने के लिए समय निकालना होगा, चार लोगों के बीच अपनी असहमति रखने का अभ्यास करना होगा, जो रूठ गए हैं, उन्हें मनाना होगा, पुरानी बातों, पुराने दोस्तों को याद करना होगा, तब जाकर हमारे दिमाग में लगी जंग दूर होगी। शब्द अभ्यास से ही आते हैं। हमें समाज से जुड़े रहना है। अकेलापन हमारी बुद्धि को बहुत अधिक शिथिल करता है। आजकल चार लोग साथ हों तो भी अलग-अलग मोबाइल देखते रहते हैं। यह भी एक तरह का अकेलापन ही है। हमें प्रयास करके मोबाइल से दूरी बनानी है और बात करना सीखना है।  

भाषाविज्ञान में एक प्रवृत्ति का उल्लेख आता है- प्रयत्न लाघव। यानी प्रयत्न घटाने की प्रवृत्ति। जैसे- स्थाली और स्तन शब्द बोलने में अधिक प्रयास करना पड़ता था, इसलिए उनके स्थान पर हम क्रमशः थाली और थन का प्रयोग करने लग गए। मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह कम प्रयास में अधिक परिणाम चाहता है। समस्त तकनीक के आविष्कार और प्रसार का आधार यही है। यही आराम खोजते-खोजते हम कैल्कुलेटर से कंप्यूटर पर आए और अब आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस का उपयोग बढ़ता जा रहा है। पहले हम तकनीक को संचालित कर रहे थे, धीरे-धीरे अब तकनीक हमें चला रही है। अधिकांश लोग तकनीक पर अत्यधिक निर्भर होते जा रहे हैं। बुद्धि का अभ्यास न करने के कारण अब उनका दिमाग शांत नहीं हो पाता और वे रात में ठीक से सो भी नहीं पाते हैं। लोगों को नहीं पता है कि शांत कैसे बैठना है, इसलिए वे पैसा देकर योग कक्षाओं में जाते हैं और तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं की भी शरण लेते हैं।  

तकनीक से हमारे समय और प्रयासों की बचत होती है, लेकिन हमें सोचना है कि बचे हुए समय और प्रयासों का हम क्या करेंगे। अगर मेरे पास समय है तो मैं पैदल जाकर मंडी से सब्जी लेकर आऊँगा। मैं बाहर निकलूँगा तो कुछ परिचित भी मिलेंगे, फिर ठीक से देखकर सब्जी-फल आदि खरीदूँगा। सब्जीवाले का भी हाल-चाल पूछ लूँगा, थोड़ा भाव-ताव भी कर लूँगा और देश-दुनिया के हाल-चाल से परिचित होकर आऊँगा। अगर समय नहीं है तो ऑनलाइन ऐप से ऑर्डर करके भी सामान मंगवा सकता हूँ। अगर मैं आराम को प्राथमिकता देते हुए हर बार ऑनलाइन ऐप से ही सामान खरीदूँगा तो मेरे परिचय का दायरा बहुत सिमट जाएगा, उपयोग नहीं होने से दिमाग और शरीर सड़ने लगेंगे और कई तरह की बीमारियाँ व अवसाद मुझे घेर लेंगे। इसलिए, अपनी बुद्धि को शिथिल होने से बचाने के लिए हर तकनीक से समय-समय पर थोड़ी दूरी बनाना आवश्यक है।

पहल - ट्रेंडसेटर फीचर्स

रचयिता - यशवंत 

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