हम सब बहुत से दोस्त जब बैठे गप्प मार रहे होते हैं तब हमारे पास यह ऑप्शन होता है कि खुद पर कोई अंगुली न उठाए उससे पहले हम दूसरे किसी निर्बल का मजाक बनाते रहते हैं। मजाक के रूप में आरंभ यह प्रयास धीरे धीरे टारगेट में परिवर्तित होने लगता है। बार बार निर्बल ही पर निशाना साधा जाता है।
एक अन्य घटना सूक्ष्म निरीक्षण में उभर कर सामने आती है अक्सर, हम जब किसी व्यक्ति से ऊब जाते हैं या नया कुछ बात करना होता है तब हम किसी समूह को टारगेट करते हैं और ऐसे ही अदल बदलकर सिलसिला जारी रहता है मसलन जाति अथवा गोत्र या मोहल्ला और फिर धर्म ...! तीसरी बात यह नोटिस करने की है कि जो काम करता है वो वैसे ही और उसी विषय पर बार बार बात घुमा कर लाता है। एक रेलवे कर्मचारी दूसरे रेलवे कर्मचारी से वो ही बात घुमा फिराकर लाएगा। खेती वाला खेती की और पशुपालक पशुओं की। पिछले कुछ समय से राजनीति में घुस गए हैं जहां पर कि सोशल मीडिया से प्रभावित ज्ञान का बखान होता है। जिद, गुस्सा और झिझक, शर्म, ग्लानि भाव आते और जाते हैं। दिमाग उसी दिशा में सोचने लगता है। लेकिन तीन अहम बातें ध्यान रखने की हैं:
१. हम दूसरों की बुराई अवश्य करते हैं।
२. पुरुष घनिष्ठ हो, तो महिलाओं की बातें करते हैं; लेकिन महिलाएं पुरुषों की बातें बहुत कम करती हैं।
३. पुरुष संगठित होने और प्रभावशाली होने के लिए वार्तालाप करता है, जबकि महिलाएं अधिकांश अपना पक्ष सही ठहराने के लिए बातें करती हैं।
यह परंपरागत तरीके से चलता आ रहा है, क्योंकि हमको पीढ़ी दर पीढ़ी बड़ों से सीखने को मिलता है और असुरक्षा की स्वाभाविक भावना भी होती है।
ईगो बराबर काम करती है और दृष्टिकोण लगातार जड़वत होता जाता है।
थोड़ी सी सफलता मिल जाने पर हम एक बारगी हौसला मिलने पर अन्य को किनारे करने की सोचने लगते हैं। अंदर की छटपटाहट कम गहरी सोच वालों में जल्दी प्रकट होने लगती है और अधिक समझ वाले में यह भावना काबू में रहने लगती है। मनुष्य जितना आर्थिक उतना ही राजनीतिक प्राणी भी है, लेकिन इन सबसे आप भिन्न हो सकते हैं!
मैं आपसे तीन नाम पूछूंगा जो आपको बिना सोचे तत्काल लिखने हैं। आप राम, श्याम राधेश्याम, मीरा लिखोगे, मैं आपसे तीन लड़कियों के नाम लिखने को कहूंगा आप पहला नाम कमला लिखोगे।
अब मैं आपको कहूंगा बिना सोचे फ्लावर बताओ, आप गुलाब बोलोगे पहला नाम, आपको रंग लिखने को कहूंगा पहला रंग आप ज्यादातर लाल लिखोगे।
ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने बचपन से पढ़ा है और ऐसे ही पढ़ा है यानि आप परंपरागत तरीके से सोचते हो।
आप खुद से सवाल नहीं करते और आगे बढ़ जाते हो।
जरा बताएं आपने आपका अपना नाम क्यों नहीं लिखा? आपके परिजनों का नाम पहले क्यों नहीं लिखा? आपने गेहूं, ज्वार, बाजरा क्यों नहीं लिखा? आपने मोगरा क्यों नहीं लिखा? या फिर आपने बैंगनी क्यों नहीं लिखा?
दिए गए उदाहरण यह बताने के लिए हैं कि आप इंग्लैंड में होते तो अंग्रेजी और तमिलनाडु में पैदा होते तो तमिल बोलते, लेकिन उत्तर भारत में पैदा हुए तो हिंदी लिख बोल रहे हो। पैदाइशी आप कुछ लेकर नहीं आए।
आप भावुक हैं या गुस्सैल अथवा शांत या आप तार्किक यह सब परवरिश का परिणाम है न कि जन्मजात।
जाहिर है आप खुद को बदल सकते हो!
बनीबनाई धारणाओं को विखंडित करने का साहस पैदा कीजिए।
जे.आर. गुर्जर
सहायक आचार्य समाजशास्त्र
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