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पूर्वाग्रहों से बचें भविष्य रचें

अमूमन ऐसा होता है कि हम किसी के बारे में सुनते हैं और उस व्यक्ति के बारे में ऐसी ही सोच बना लेते हैं। यहां तक कि उसके मिलने पर भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। किसी ने कहा कि वो अच्छा है या वो ईमानदार है अथवा वो बेईमान है। आगे यह कि 'अरे सावधान रहना.......।' इत्यादि।                  

ठीक इसी प्रकार पूर्वाग्रहों के वशीभूत हो हम किसी समुदाय या किसी शहर अथवा किसी गांव के विषय में स्वतः पूर्वधारणा बना लेते हैं। कई बार ऐसी धारणा बिना किसी वजह के भी बन जाती है। किसी का चेहरा तो किसी की आवाज या फिर किसी का व्यवहार देखकर हम धारणा बना लेते हैं। ऐसे पूर्वाग्रह हमारी सही सोच और दृष्टिकोण बनाने में स्वतः बाधा उत्पन्न कर एक निश्चित दायरा बना लेते हैं।

यद्यपि ऐसा किसी घटना और किसी भी विषय वस्तु पर स्वतः बन सकता है, लेकिन यह आदतन और स्वाभाविक भी होता है। हम मस्तिष्क को उमर भर इसी रूप में ट्रेनिंग देते हैं तो उसके पीछे कुछ ऐसे प्रयास होते हैं जो हमारे पूर्वाग्रह के निर्माण में सहायक होते हैं। ये ऐसे होते हैं जो परोक्ष अपरोक्ष रूप से हमको और हमारे बच्चों को तथा परिजनों को कई जगह फोर्स करते हैं।

खासकर पुरुष, महिलाओं के दिमाग में स्वभावतः घुसने का प्रयास करता है। पुरुष एक बार संवेगों या भावनाओं से अथवा परिवार में अधिकार से फोर्स कर दिमाग पर कब्जा करता है। कमजोर और बेरोजगार के दिमाग पर आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति कब्जा करता है। इनके अतिरिक्त वातावरण भी प्रभाव डालता है, लेकिन हमको सबसे पहले अपने खुद के संवेगों को समझना होगा तभी हम बनी बनाई  धारणा को तोड़ पाने में सक्षम हो सकेंगे।

पूरा सिस्टम भी एक बार वैचारिक जंजीरों को तोड़ने से ध्वस्त होगा फिर आप सही चिंतन करेंगे।

नाहक किसी से संबंध खराब न करें, संबंध जोड़ें और आदर्श मित्र बनें। आप फोर्स कर किसी के दिमाग में न घुसें यह एक बड़ी कुरीति है, तो गुलाम बनाने की आदत आदिम है। हमें सभ्य बनना है और आदर्श भी। पूर्वाग्रहों को ढोना नहीं है मार्ग प्रशस्त करना है।

रचनाकार

जे.आर. गुर्जर

सहायक आचार्य समाजशास्त्र

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