उत्तराखंड के लब्धप्रतिष्ठ कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने समाज में करुणा की भूमिका को जानते समझते हुए करुणाई शीर्षक से एक काव्य रचना हमको भेजी है जो इस प्रकार है।
करुणा के सागर ईश्वर से मानव ने करुणाई पाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।
करुणा नहीं है जिस मानव में वो मानव है पशु समान।
बिन करुणा के हो नहीं सकती कोई भी भक्ति भगवान।
पत्थर सा ही हो जाता है करुण भाव के बिन इन्सान।
संत हृदय किसका है जग में करुणा से होती पहचान।
करुण भाव बिन कोई विनती नहीं ईश को देत सुनाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।१।।
भावुकता और करुणाई में जन्म जन्म का नाता पाया।
दूजे की लख पीर करुण मन नीर नयन में है भर लाया।
भावुकता से चरित्र मनुष्य का स्वतः ही सम्मुख आ जाता।
भावुक होकर करुण कलम से भक्त सदा भक्ति लिख पाता।
सरल, सौम्य और सत्य हृदय में करुणा ही देती है छाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।२।।
धर्म कर्म कोई करुणाई बिन नहीं मनुज से हो सकता है।
मन में पनपी करुणा से ही सत्कर्मों में खो सकता है।
अत्याचार कभी जीवों पर करुणामयी नहीं करता है।
वो तो रक्षा जीवन भर ही जीवों की मन से करता है।
निरीह जीव की जान जो लेता वो ही कहलाता कसाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।३।।
सुनकर, आर्त पुकार द्रौपदी कृष्ण स्वयं ही दौड़े आये।
चुप से आकर चीर बढ़ाया किन्तु दीख नहीं वो पाये।
माता मन के करुण भाव से शिशु का लालन पालन करती।
करुणा की मूरत बनकर वो जीवन भर ही जीती मरती।
सच्चा मानव सर पर अपने करुणा की रखता परछाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।४।। करुणाई के रूप अनेकों हमने इस जगति में पाये।
मानव ही क्या पशु पक्षी भी इसमें लिप्त सदा से पाये।
हिंसक पशु तक अहिंसक पर करुणा बरसाते मिल जाते।
संग संग उन्हें देखकर करुणामयी हृदय खिल जाते।
ये सब यहां अलौकिक लीला ईश्वर की देती दिखलाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।५।।
करुणाई रहती है हर पल संतजनों के मन में छाई।
लेकिन कुछ ने दानव बनकर इसको मन से दूर भगाई।
शत्रु तक पर जब भी मानव अपनी करुणा दर्शाता है।
भूल शत्रुता को वो अपनी आलिंगन करता पाता है।
करुणा से ही मानव जग में करता आया सदा भलाई।
मानव के मानवता गुण में अनुपम गुण होता करुणाई।।६।।
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