सितंबर के महीने में जब गर्मी एवं सरकारी बस में यात्रा करने के तनाव से हाल -बेहाल मैं पति के साथ पहली बार 'आदर्श भारती संस्कृत महाविद्यालय' के प्रांगण में बीएड के प्रवेश के लिए पहुंची थी |
इससे पहले प्रवेश परीक्षा..परिणाम …काउंसलिंग …आदि के लिए कई बार प्रयाग से बनारस तक का आवागमन होता रहा था और मैं इन सब कारणों से बहुत तनाव में थी |
तनाव और परेशानी का कारण मात्र गर्मी या यात्राएं नहीं बल्कि बीएड की ट्रेनिंग पूरी करना और अपने परिवार की देखभाल न कर पाने की असमंजस की स्थिति का होना था |जिस पर मैं चाह करके भी कोई नियंत्रण नहीं कर पा रही थी |
जब पहली बार मैं शर्मा सर से मिली तब मेरा शिक्षिका -मस्तिष्क बुद्धिमान और चतुर होने के भाव से कुछ गर्वित हो रहा था |
जब मैं उनसे मिली ,उस समय कॉलेज का दैनिक समय -काल समाप्त हो रहा था ,अतः शर्मा सर ने मुझसे कहा कि —
ठीक है …फलां दिनांक को आओ …तुम्हारा एडमिशन हो जाएगा|
अब मैं बड़ी ऊहापोह में पड़ गई कि कहीं ऐसा ना हो कि मैं जब आऊं तो मुझसे यह कह दिया जाए आप निर्धारित तिथि को उपस्थित नहीं हुई अतः आप को प्रवेश नहीं दिया जाएगा…अथवा कोई अन्य समस्या उठ खड़ी हो |
इसी विचार से मैं अचानक ही शर्मा सर से बोल पड़ी —
सर ..! लेकिन ये कैसे पता चलेगा कि मैं यहां आज उपस्थित हुई थी ?
मेरी मेरी बात सुनकर उन्होंने ,जो कि कुछ लिखने में व्यस्त थे ,सिर उठाकर मेरी ओर एक गहरी दृष्टि से देखा और हाथ बढ़ा कर बोले —
लाओ मुझे दो फार्म …!
मैंने धीरे से फार्म उनकी और बढ़ा दिया |
उन्होंने फार्म के मुख्य पृष्ठ के एक कोने में अपना हस्ताक्षर कर दिया और मुझे वापस लौटा दिया |
मैंने मुस्कुराकर उनका धन्यवाद किया और थोड़ा ध्यान से उन्हें देखा ..|
अधेड़ अवस्था… गेहुआं रंग…खिचड़ी बाल ..दाढ़ी कुछ बढ़ी हुई -सी ..दुबला -पतला शरीर ..ऊंचा माथा..नुकीली नाक …होठों पर हल्की मुस्कान…गाल कुछ धंसे हुए -से ..जिन पर अनुभव की लक़ीरों को साफ-साफ पढ़ा जा सकता था |
मैंने उन्हें एक बार फिर हाथ जोड़कर धन्यवाद किया और वापस आ गई |
यह थी मेरी शर्मा सर से पहली मुलाकात !
दोबारा एडमिशन लेने वापस पहुँचकर उनके सामने जाने पर मुझे अपने पूर्व में किये गए अविश्वास पर बड़ा संकोच हो रहा था..पर उनकी सरलता ने पल-पल मेरा हौसला बढ़ाया था|
प्रवेश की औपचारिकता पूरी करने के बाद उनके व्यवहार से मुझे इतना संबल मिला कि मैंने उनसे एक विनती की —
सर ..!अगर इलाहाबाद के कॉलेजों से कोई प्रशिक्षु यहां आना चाहे …तो.. कृपया मेरा स्थानांतरण इलाहाबाद के लिए कर दिया जाए !
उन्होंने मुझसे पूछा —क्यों जाना चाहती हो इलाहाबाद ?
यहां क्या परेशानी है ?
मैंने विनती भरे स्वर में कहा …सर..! मुझे यहां कोई परेशानी नहीं लेकिन मेरे बच्चे छोटे- छोटे हैं इसलिए मैं इलाहाबाद से ही अपना प्रशिक्षण पूरा करना चाहती हूं !
तब उन्होंने कहा — क्यों परेशान होती हो ?
इस स्थानांतरण के चक्कर में तुम्हें बार-बार इलाहाबाद ,बनारस और जौनपुर के चक्कर लगाने पड़ेंगे और तुम परेशान हो जाओगी!
अगर जो सुविधा तुम्हें इलाहाबाद में मिलती हो वही सुविधा मैं यहां पर तुम्हें दे दूं …क्या तब भी तुम इलाहाबाद से ही करना चाहोगी ?
उनकी बातों का सीधा मंतव्य मैं समझ चुकी थी …और मैंने उन्हें एक बार फिर हृदय से धन्यवाद किया | वापस कक्षा में जाकर कक्षाएं लीं |
वहीं पर छात्रों से पता चला था कि उस कॉलेज में दशहरे और दीपावली की एक साथ लगभग 20 दिनों का की छुट्टियां हो जाती हैं मैं मन ही मन खुश थी चलो 20 दिन की छुट्टी है!
लगभग 20 -25 दिन बाद जब मैं वापस कॉलेज पहुंची तो पता चला कि इस वर्ष छुट्टियां लंबी नहीं हुई थी ,अपितु त्यौहार पर ही चार -छ:दिनों की छुट्टियां हुई थीं |
जब मैं क्लास में उपस्थित हुई तो कॉलेज के प्रिंसिपल सर हिंदी की कक्षा लेने आए |उन्होंने उपस्थिति लेते समय मेरा नाम पुकारा और मैंने जैसे ही 'यस सर' कहा, उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा..
खड़ी हो जाइए मैडम !आप तो इंस्पेक्शन करने आई होंगी!
चलिए …जरा स्टूडेंट से कुछ पूछ पूछ लीजिए ..!
अब मेरा हाल बुरा ..…मैं खड़ी हो गई …प्रिंसिपल सर ने खूब बातें सुनाई मैं चुपचाप खड़ी रही |
कुछ देर खड़े रहने के बाद उन्होंने मुझे बैठा दिया |
उसके बाद शर्मा सर की क्लास थी | शर्मा सर कक्षा में आए और उन्होंने भी उपस्थिति लेना शुरू किया ,साथ ही ऐसे प्रशिक्षणार्थियों को जो कई दिनों से उपस्थित नहीं हुए थे , उन्हें एक नोटिस लिफाफे में पकड़ाते जा रहे थे|
जब उन्होंने मेरा नाम बोला और मैंने उपस्थिति दी तो उन्होंने मेरी ओर देखकर बड़े प्यार से कहा —
अरे नीरज …! आ गई तुम ..!और मुझे भी वह लेटर दे दिया |
क्लास हो जाने के बाद मैं उनके पास गई और बोली —सर !अब इसका क्या करना है ?
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —अरे करना क्या है …..बस एक एप्लीकेशन लिख कर मुझे दे दो और जाओ क्लास करो !
सच कहूं …उनकी एक-एक बातें…उनकी सहृदयता …उनका स्नेह …याद करते ही मुझे ऐसी सुखद अनुभूति होती है …जैसा मैंने कभी भी कहीं नहीं पाया था |
एक पितावत् निश्छल प्रेम…जो मेरे जीवन की अमूल्य निधि बन चुका है अब…और संभवतः मृत्यु के बाद भी मेरे साथ ही रहेगा.. क्योंकि उसका संबंध मेरी आत्मा से जुड़ चुका है!
वह केवल मेरे प्रति इतने उदार नहीं थे बल्कि सभी से स्नेहपूर्वक मिलते थे | पढ़ाते इतना अच्छा ..कि लगता कि केवल यही पढ़ाते रहें पूरा दिन |
जब कोई प्रशिक्षु कुछ गलत कहता या करता , तो बड़े प्यार से बोलते —
अरे मास्टर साहब !ऐसे ही करोगे तो बच्चों को क्या सिखाओगे?
मुझे याद है दिसंबर -जनवरी के ठंड में कोहरे भरा मौसम और हमारी माइक्रो टीचिंग |
मैं 15 दिनों तक लगातार वहां रही | उस ठंड के मौसम में भयंकर कोहरा होता था | सवेरे 9:00 बजे कॉलेज का शुरू होता था | सड़क से कॉलेज की ओर आने वाले रास्ते पर चलती हुई धुंध में एक हल्की झुकी हुई आकृति दिखाई देती…और हम सब समझ जाते थे कि शर्मा सर आ रहे हैं |
क्योंकि उनकी लंबाई अधिक और छरहरा शरीर होने के कारण वे पीठ और गर्दन थोड़ा -सा झुका कर चलते थे |पेट अंदर को धंसा हुआ , गले में मफलर लपेटे हुए वह आते हुए दिखाई पड़ते थे |
कुछ भी पूछने जाओ , बड़े स्नेह से बताते थे| उनके समीप रहते हुए उनसे शिक्षा पाते हुए ऐसी सुखद अनुभूति हुई थी कि जब -जब याद करती हूं उन्हें…तब -तब एक अद्भुत प्रेम का एहसास होता है |
मुझे अच्छे से याद है जब हमारे टीचिंग-सत्र में विदाई समारोह होना था , मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि B.Ed में टीचिंग होना एक विशेष सत्र होता है | उसके लिए सारे लड़के दूसरे स्कूल में पढ़ाने जाते थे और हम सब लड़कियां हमारे कॉलेज प्रांगण में ही गर्ल्स इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे , इसलिए लड़कों का समापन समारोह अन्यत्र हुआ और हम लड़कियों का अन्यत्र |
तो समापन समारोह में सभा -संचालन के लिए मैंने अपना नाम दिया |शर्मा सर से जब बताया तो उन्होंने मुझसे दो लाइन बोलने के लिए कहा | जब मैंने बोल कर सुनाया तो कहा ठीक है कर लेना |
मैंने समापन में सभा -संचालन किया और अच्छे से किया उनके उद्बोधन के लिए मैंने पहली बार उनके नाम से पहले 'प्रातः स्मरणीय' शब्द जोड़ा…! देख रही थी मैं शर्मा सर मेरे संबोधन से बड़े संतुष्ट और प्रसन्न दिखाई दे रहे थे |व्यक्त नहीं करते थे लेकिन उनके चेहरे के भावों को देख कर मुझे प्रतीत होता था कि हां उनको अच्छा लगा |
सच कहूं तो उनसे पढ़ने के बाद अथवा उनसे मिलने के बाद उनकी विद्वत्ता….उनके व्यवहार …उनकी शालीनता …सरलता -सादगी …क्या-क्या कहूं …क्या नहीं था उनके व्यक्तित्व में? विभागाध्यक्ष होते हुए भी उनके मुख पर जरा भी रौब या अहंकार का भाव नहीं था | इतने सज्जन के उन्हें देखकर बस एक ही विचार मन में आता था कि —
'सादा जीवन उच्च विचार' की जीती -जागती मूर्ति ऐसी ही होती होगी!
ऐसे प्रात:स्मरणीय शर्मा सर के श्री चरणों में मेरे भावों की पुष्पांजलि अर्पित करती हूँ!!
नमन🙏
—नीरजलता सिंह
(कोरा प्रश्न उत्तर प्लेटफार्म से साभार)
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