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उलझन - जीवन भर सकारात्मक रहकर जब हम अर्थपूर्ण और गुणात्मक जीवन सफलतापूर्वक व्यतीत कर सकते हैं तो नकारात्मकता का इतना प्रभाव समाज पर क्यों?

जीवन और शतरंज के खेल में अद्भुत समानता है। जब हमारे सारे प्यादे, राजा, घोड़े आदि सभी बिल्कुल उपयुक्त जगह पर होते हैं, उसके बाद भी, जब तक खेल चलता है, हमें कोई न कोई चाल चलनी ही पड़ती है। हम जड़वत एक विचार को पकड़कर जीवन नहीं बिता सकते। इस गतिशील जीवन में बाहर और भीतर परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, यह स्वीकार करके ही हमें जीवन को सार्थक बनाने के उपाय करने हैं। हम जो कपड़े पहनते हैं, समय के साथ वे गंदे हो ही जाते हैं। हम उन्हें धोकर फिर से पहनने योग्य बना लेते हैं। इसी तरह व्यक्ति को भी अपने विचार स्वच्छ व सकारात्मक रखने हैं। भौतिकी का नियम है कि नेगेटिव और पॉज़िटिव एकदूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। सकारात्मकता भी धीरे-धीरे नकारात्मकता की ओर जाती है। इसी तरह नकारात्मकता भी सकारात्मकता की ओर आकर्षित होती है। हम सोचते हैं “हम श्रेष्ठ हैं”। कुछ समय बाद पता ही नहीं चलता कि कब यह विचार “हम ही श्रेष्ठ हैं” में बदल गया। हमें लगता है कि जो हमारे तरीके से नहीं जी रहा, हमारी तरह व्यवहार नहीं कर रहा, वह श्रेष्ठ नहीं है, उचित नहीं है। इस तरह हम पॉज़िटिव से नेगेटिव हो जाते हैं। कौनसा विचार या व्यवहार सकारात्मक है, कौनसा नहीं, यह व्यक्ति का अपना निर्णय है। मोटे तौर पर, दूसरों को परेशान करने वाले और पशुता की ओर ले जाने वाले विचार तथा व्यवहार नकारात्मक माने जाते हैं। इसी तरह, सामाजिक, वैचारिक, आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने वाले तथा दूसरों को भी उस ओर प्रेरित करने वाले विचार सकारात्मक माने जाते हैं। इस बात पर निरंतर चिंतन करना चाहिए कि हमारे विचार और व्यवहार सकारात्मक हैं या नहीं। आज की ताज़ा सब्जी कल बासी हो जाएगी। इसी तरह विचार भी बासी हो सकते हैं। नएपन का स्वागत और पुराने में जो अप्रासंगिक हो चुका है, उसे हटाना, ये दोनों निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। व्यक्ति को इस पर कार्य करते रहना चाहिए। मनुष्य एक जागरूक प्राणी है। इसलिए, समाज में नकारात्मक प्रवृत्तियाँ देखकर हमारा चिंतित होना स्वाभाविक है। हम सोचते हैं कि लोग अधोगति की ओर क्यों बढ़ रहे हैं, क्यों नकारात्मक विचारों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और क्यों मानवीय मूल्य भुलाए जा रहे हैं। हम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए क्या प्रयास करें, यह विचार आता रहता है। हालांकि हम यह जानते हैं कि दुनिया में कई बड़े महापुरुषों ने अनेक बदलाव लाए लेकिन थोड़े समय बाद दुनिया फिर वैसे ही चलने लग जाती है। जागरूक व्यक्ति को पहले तो स्वयं को निरंतर प्रगतिशील और विचारशील बनना होगा, अच्छे लोगों के साथ रहना होगा और नए कार्यों में प्रवृत्त रहना होगा ताकि नकारात्मकता उस पर हावी न हो। सकारात्मक और जागरूक लोगों को देखकर कुछ लोग अवश्य सकारात्मक कार्यों की ओर प्रवृत्त होंगे और उन्हें देखकर फिर दूसरे लोग भी उनके जैसे बनने की सोच सकते हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी है लेकिन अप्रत्याशित भी है। हमारे अच्छे कार्यों का असर कितना अच्छा हो सकता है, इसके परिणाम एक दिन में नहीं दिख सकते। अंततः हमें मानना होगा कि दुनिया में हर तरह की प्रवृत्तियाँ चलती ही रहेंगी। कुछ लोग चुम्बक बनेंगे और शेष लोग उनकी ओर आकर्षित होंगे। लोग नकारात्मकता की ओर अधिक आकर्षित होंगे क्योंकि उसमें मनुष्यता से नीचे फिसल कर पशुता की ओर जाना है। मनुष्यता से देवत्व की ओर चढ़ाई करना हर किसी के बस की बात नहीं है। इसलिए हम सबकी चिंता करके कुछ हासिल नहीं कर सकते। हम मुख्यतः अपने जीवन के लिए उत्तरदायी हैं। हमें अपना जीवन ऐसा बनाना है कि हम सकारात्मक गुणों के उदाहरण बनें। अगर कुछ लोग भी हमारे जैसा बनना चाहें तो यह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। रचनाकार - यशवंत

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