उलझन सुलझन
'उलझन सुलझन' पत्र मनोहर, गागर में सागर सा पाया।
पत्र भले हो कुछ पन्नों का, लेकिन अति उपयोगी पाया।।
विविध लेख जो मिले हैं इसमें, हृदय को छूने वाले हैं।
भाषा सरल सौम्य है इसकी, हर जन ने पढ़कर सुख पाया।
सामाजिक समरसता इसमें, जनजीवन की मिली कहानी।
बड़ी बात को दो शब्दों में काव्य रूप में कहती वाणी।।
संपादकीय कॉलम इसका मन के भावों को दर्शाता।
संस्कार इसमें है झलका, सभी क्षेत्रों की मिली निशानी।।
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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