डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारत की एक ऐसी धरोहर हैं, जिस पर प्रत्येक भारतीय को गर्व है। भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में निर्विवाद कार्यकाल निकालने और अपने अनुसंधानों व सशक्त वैज्ञानिक नेतृत्व से भारत को सामरिक शक्तियों में पूरे विश्व में एक पहचान दिलाने वाले डॉ. कलाम आजादी को हमारे पूर्वजों से मिले एक ऐसे उपहार के रूप में मानते थे जिसे संभाले रखना और अगली पीढ़ी तक सौंपना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। वैसे भी आजादी का मतलब केवल औपनिवेशिक शासन से प्रशासनिक नियंत्रण का अपने देश के लोगो द्वारा संचालित किया जाना मात्र ही नहीं होता। आजादी का मतलब उस मानसिक गुलामी से मुक्ति भी है, जो 1000 वर्षों से अधिक समय तक भारत के गुलाम रहने से हमारी जनता के व्यवहार में रच-बस गई है। इस मानसिक गुलामी के लक्षण आजादी के 70 वर्ष बाद भी हमारे देश की सामूहिक चेतना में नजर आते हैं। जब हम अपने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर नहीं बोलते, परिवार में संचालित पितृ सत्तात्मक परंपरा पर मौन रहते हैं, देश में नेताओं द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अधिकारियों की अकर्मण्यता पर चुप्पी साध लेते हैं, शिक्षण संस्थाओं की लूट या उद्योगों व कंपनियों में संचालित शोषण से नजर फेर लेते हैं और ऐसी ही अन्य कई जरूरी बातों पर प्रश्न नहीं उठाने या आवाज बुलंद करने का प्रयास नहीं करते तो कहीं ना कहीं हम गुलामी में ही जी रहे हैं। प्रश्न करना एक नागरिक के रूप में हमारे स्वतंत्र होने की पहचान है। प्रसिद्ध दार्शनिक व सूफी संत रूमी के अनुसार फरिश्ते अपने ज्ञान के कारण मुक्त हैं, तो पशु अपनी अज्ञानता के कारण। लेकिन इन दोनों के मध्य खड़ा मानव भ्रमित व संघर्षरत है। अतः यह हमें तय करना है कि हम अज्ञानता से युक्त पशु समान जीवन व्यतीत करना चाहते हैं या अज्ञानता से आजादी प्राप्त कर फरिश्ते के समान क्योंकि आनंद या सुख की अनुभूति तो दोनों हो स्थितियों में संभव है। अंग्रेजी भाषा की एक कहावत है- 'Ignorance is bliss', लेकिन इसका प्रयोग दअरसल मूढ़ व्यक्तियों या ज्ञान के अभाव वालों के लिए व्यंग्य के रूप में किया जाता है।
डॉ. कलाम का मानना था कि एक शिक्षित व्यक्ति समाज की धरोहर होता है लेकिन शिक्षित होने या शिक्षा प्राप्त करने से उनका मतलब केवल पाठ्यक्रम की पुस्तकों को पढ़ना या डिग्रियां प्राप्त कर लेना नहीं था। दरअसल पाठ्यक्रम केवल जीवन जीने के लिए आवश्यक सामान्य जानकारी एकत्रित करना मात्र है और डिग्री केवल हमें बेहतर जीवन जीने के लिए आवश्यक रोजगार दिलाने के काम आती है। डॉ. कलाम का मानना था कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से जागरूक नागरिक बनाना है जिससे कि वो गहनता से सोच सके और उन तरीकों को पहचान सके जो उनके लिए सत्य हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षित होने से कलाम का मतलब था कि एक नागरिक के तौर पर हम अपनी इस जिम्मेदारी को समझ सकें कि हम समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। हम अपने जीवनकाल में समाज व वातावरण से बहुत कुछ लेते हैं तो उसे वापस करने की जिम्मेदारी भी हमारी है। कलाम का मानना था कि शिक्षा और ज्ञान यद्यपि दोनों अलग-अलग संप्रत्यय हैं, लेकिन दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं।
कलाम केवल किताबें पढ़ना, स्कूल-कॉलेज जाने को ही शिक्षा नहीं मानते थे। उनके अनुसार शिक्षा का वास्तविक अर्थ है। एक जाग्रत समाज की रचना इस जाग्रत समाज के उन्होंने तीन अंग बताए। प्रथम, ऐसी शिक्षा जिसके निश्चित मूल्य हो। द्वितीय, धर्म का आध्यात्मिक शक्ति में परिवर्तन और तृतीय, आर्थिक विकास।
"सा विद्या या विमुक्तये"
का उद्घोष करने वाले राष्ट्र में आज भी एक नागरिक या व्यक्ति के रूप में हम विभिन्न संरचनाओं में कैद नजर आते हैं। मुक्ति का मतलब है - बेरोजगारी से मुक्ति, गरीबी से छुटकारा, अंधविश्वास या कर्मकांड को छोड़ना, नशे व व्यसनों से मुक्ति, अहंकार का नाश, विलासिता व अन्य मायाजाल से आजादी क्योंकि एक मानव के तौर पर इन सबके बंधन हमें निर्बल बनाते हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक संदर्भ में साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, नस्ल या जातिवाद, राजनेताओं की भक्ति आदि कई ऐसे मनोवैज्ञानिक बंधनों से आजादी प्राप्त करना क्योंकि ये सब हमें एक नागरिक के रूप में विफल साबित करते हैं। लेकिन सच यह है कि आज भी हम कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व ऐतिहासिक प्रतिमानों के गुलाम नजर आते हैं, जो हमारे जीवन को उत्कर्ष की बजाए अपकर्ष की तरफ लेकर जाते हैं, लेकिन हमें इन बंधनो का अहसास नहीं हो पाता। डॉ. कलाम भारत की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता व हमारे पूर्वजों के ज्ञान से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार प्राचीन भारत एक ज्ञानवान समाज था। कालांतर में हमलों और औपनिवेशिक शासन ने इसकी योग्यता को चौपट कर डाला। हमारी जनता का अस्तित्व निचले स्तरों तक सिमटकर रह गया। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तब तक हमारे युवाओं की सारी ऊर्जा स्वतंत्रता संग्राम में खर्च हो चुकी थी। वे लंबे संघर्ष के बाद थकान का अनुभव करने लगे थे, अतः अपने लक्ष्यों को उच्च व महान बनाकर उसके लिए प्रयास करने की बजाए हम साधारण जीवन से संतुष्ट होने लगे। इसीलिए कलाम युवाओं को प्रेरित किया करते थे, क्योंकि भारत ज्ञान की भूमि है और उसे अपने इस पहलू की नए सिरे से खोज करनी चाहिए। एक बार यह खोज कर कर ली गई तो जीवन की गुणवत्ता को प्राप्त करने के लिए हमें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा यानी कि विश्व पटल पर भारत को फिर से नेतृत्व हासिल करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
आज देश के युवाओं को कलाम द्वारा दी गई सीख 'सपने देखो और उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास करो तथा छोटा लक्ष्य एक अपराध है' जैसे शब्दों को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेना चाहिए। आजादी के 70 वर्ष बाद आज भी देश का युवा जब हिंसा, सांप्रदायिकता, जातिवाद, नस्लवाद, हिंसा व उपद्रव जैसी देश को तोड़ने वाली मानसिकता में उलझा हुआ है तब हमें कलाम का सपना टूटता नजर आता है। कलाम का कहना था कि गूगल के पास हमारी रुचियों व अभिवृत्तियों को जानने की तकनीक है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल हमें बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। राजनीतिक पार्टियों ने युवाओं को अपने मकड़जाल में फंसाया हुआ है। इंटरनेट युग ने बुरी व विध्वंसक ताकतों को एक सुविधा प्रदान की है। हम प्रोपेगेंडा में उलझे हुए हैं और किसी अन्य द्वारा संचालित हैं, लेकिन हमें इस बात का अहसास ही नहीं हो पाता। किसी अन्य की सोच से संचालित होना हमें मानसिक गुलाम बना देता है। आजादी के ये मायने कभी नहीं थे। स्वतंत्रता का उत्सव केवल तभी सार्थक है जब हम अपनी सोच स्वतंत्र रूप से विकसित कर सकें।
डॉ. प्रशान्त कुमार
(स्वरचित पुस्तक शिक्षा, कलाम की कलम से)
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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