नई दिल्ली (रिपोर्टर श्री वी.के. शुक्ला)
सुशिक्षित और आत्मनिर्भर समाज ही सशक्त और उन्नत राष्ट्र का आधार होता है। शिक्षा का प्रसार दूरदराज के क्षेत्रों में उन युवाओं तक भी हो जहां इसकी सहज सुविधा नहीं है, तो विकास के साथ स्वावलंबन को भी बल मिलता है। इसी उद्देश्य के साथ शुरू की गई दिल्ली पुलिस के अधिकारी लाल बहार की अनूठी पहल रंग ला रही है।
लाल बहार ने युवाओं तक ज्ञान का भंडार पहुंचाने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गांव-गांव में पुस्तकालय खोलने का संकल्प लिया। धन की व्यवस्था के लिए विवाह में मिलने वाले शगुन की राशि को व्यय करने का विचार बनाया और परिणाम यह है कि अब तक सात राज्यों में 522 पुस्तकालय खोले जा चुके हैं।
पहल को उस समय प्रोत्साहन मिला, जब बीते दिनों भारत सरकार ने नई दिल्ली में आयोजित लाइब्रेरी फेस्टिवल में बिना शुल्क इस समूह को स्टाल का स्थान प्रदान किया।
इस पहल से गांवों के युवाओं को एक स्थान पर बैठकर पढ़ाई तर्कसंगत तरीके से करने का अवसर मिला है। दिल्ली पुलिस के मानवाधिकार आयोग में तैनात अधिकारी लाल बहार की इस पहल में अब पुलिस, शिक्षा, आयकर और परिवहन विभाग के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल हो चुके हैं। कोरोना काल में अगस्त 2020 में इस पर काम शुरू हुआ था और गाजियाबाद के गनौली में पहला पुस्तकालय खोला गया था। इस अभियान को ग्राम पाठशाला का नाम दिया गया। ग्राम पाठशालाओं में जिले में तैनात आइएएस, आइपीएस अधिकारी पहुंचकर युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के सूत्र बताते हैं और प्रेरित करते हैं। इनके साथ साथ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय का साथ भी इस अभियान को मिल रहा है।
दिल्ली पुलिस के मानवाधिकार आयोग में तैनात अधिकारी लाल बहार बताते हैं कि वर्ष 2020 में वैश्विक कोरोना महामारी आई तो वह जर्जर मकान की मरम्मत के उद्देश्य से गाजियाबाद ग्राम पाठशाला बनाया गया। कुछ ही समय में पाठशाला में पड़ोसी गांव के युवा भी आने लगे। तब अन्य गांवों में भी पुस्तकालय खुलवाने की योजना को मूर्त रूप दिया गया। विशेष बात यह कि न कोई एनजीओ है और न ही पद। हर रविवार को लाल बहार और उनके साथी गांवों की ओर निकलते हैं और अभिभावकों और युवाओं से पुस्तकालय बनवाने पर बात करते हैं। चंदा होता है और सहमति से किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदारी दे दी जाती है।
एक बार वो अपने गांव गनौली गए। वहीं उन्होंने पाया कि गांव में शिक्षा का वातावरण नहीं है और युवा इधर-उधर बैठे रहते हैं। युवाओं ने बताया कि घर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी नहीं हो पाती है। गांव में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां बैठकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें। यहीं से उनके मन में ग्राम पाठशाला का विचार आया। गांव के लोगों को एकत्र किया, योजना के बारे में बताया और सबसे पहले स्वयं धन दिया। फिर ग्रामीणों ने दान दिया।
अभियान के सूत्रधार लाल बहार की पहल से अभियान से जुड़े सरकारी शिक्षक अजयपाल नागर बताते हैं कि पुस्कालय के संचालन के लिए धन चाहिए था। इसके लिए हम सबने मिलकर परंपरा को माध्यम बनाया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के गांवों में विवाह में विदाई से पहले वर पक्ष की तरफ से कन्या के गांव के मंदिर के लिए दान देने की परंपरा है। इसे 'शगुन' माना जाता है। अब शगुन में ग्राम पाठशाला के लिए भी धन मांगा जाता है। इस परंपरा के माध्यम से आसानी से धन एकत्र होने लगा है। इसमें ग्रामीण भी यथासंभव सहयोग कर रहे हैं।
जागरण विशेष
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें