भाव
भावों की खेती है अनुपम हर हृदय में लहराती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल-पल मन को बहलाती है।
आशा की पोषकता इसमें नवल ऊर्जा भरती रहती।
पावन बनी भावना इससे मन को निर्मल करती रहती।
भावों में भावुकता आकर जीवन का अहसास कराती।
हर पीड़ित के साथ खड़ी हो पीड़ित में विश्वास बढ़ाती।
मन का पंछी मन भावों के संबल से ही उड़ पाता है।
लक्ष्य सिद्धि के बिना सफर से नहीं बीच से मुड़ पाता है।
भावुक मन को मंजिल अपनी बड़ी दूर से दिख जाती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल-पल मन को बहलाती है।।१।।
जीवन सफर बहुत लम्बा है भावों बिल कैसे चल पाये।
भाव नहीं हैं जिस भी मन में नीरस मन वो ही कहलाये।
बिन भावों के गीत मिलन के नहीं कोई भी गा पाता है।
हृदय में आशा का दीपक केवल भाव जला पाता है।
भरता भावों के कारण ही मानव के नयनों का प्याला।
विरह पीर में तो पाया है भावों का ही खेलराला।
सिहरन सी उठती पांवों में रो-रो कर भी मुस्काती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल-पल मन को बहलाती है।।२।।
देश भक्ति व ईश भक्ति में भावों का ही योगदान है।
बिन भावों के द्रवित होता पाया कहाँ है भगवान है।
देशभक्ति की महा भावना से ही सैनिक रक्षा करता।
राष्ट्र भक्ति के महा भाव से वो नित सीमा पर मरता!
जब तक भाव नहीं जगते हैं हाथ पैर भी कब हिल पाते।
बिन भावों के प्रेमी भी दो कहां परस्पर हैं मिल पाते।
उमड़े मन के भावों से ही भारत जय बोली जाती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल-पल मन को बहलाती है।।३।।
बिन भावों के सृजन कोई नहीं कभी भी हो पाता है।
कहाँ किसी को मन का कानन बिन सृजन के महकाता है।
मानव का तो जन्म स्वयं ही केवल भावों के कारण है।
स्वयं विधि ने भावुकतावश पूरी धरती की धारण है।
माँ के द्वारा शिशु का पालन केवल यादों का ही फल है।
शिशु बिना भावुक होकर मां दिखी सदा होती बेकल है।
मृदुल भावों से ही मैया उर से बालक चिपकाती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल-पल मंत्र को बहलाती है।। ४।।
मन के भावों से ही पाया प्रेम मनुज में सदा उपजता।
जब भावों की मृत्यु होती जीवन पाया सदा उजड़ता।
मन में भाव उपजते दो जब तब ही दौड़ी आती उलझन।
लेकिन भावों की उलझन में स्वयं भाव ही बनते सुलझन।
हर मानव के भाव अलग हैं, लेकिन रखते सभी मान हैं।
झगड़ा होता अहं भाव जब दूजे का नहिं रखे ध्यान हैं।
युगों युगों से यही कहानी भावों की गाई जाती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल पल मन को बहलाती है।।५।।
घर से लेकर दुनिया भर में भाव सदा देखे टकराते।
मात्र भाव मेरे अच्छे है अहं मनुष्य का हैं दरशाते।
टकरायें जब भाव जगत में तब-तब युद्ध हुए हैं भारी।
भावों की चक्की में सबसे ज्यादा पिसती देखी नारी।
कर दिखलायेंगे भावों को जब भी हम जग में सम्मानित।
फिर तो प्रेम डगर को कोई कर नहीं सकता जग में बाधित।
भावों की नगरी है पावन वहां न कटुता रुक पाती है।
हरी भरी मोहकता इसकी पल पल मन को बहलाती है।।६।।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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