कोई भी महिला अगर भारतीय वेशभूषा में हो और बड़ी सेलिब्रेटी हो तो ज्ञानचंदों के लिए बाकी सभी आधुनिक जमाने की लड़कियों को संस्कार सिखाने के अवसर मिले जाते हैं। डेढ़ जीबी डेटा का पूरा उपयोग करने वाले कॉलोनी के सभी अंकल तुरंत वाटसअप ग्रुप में फॉरवर्ड करने लगते हैं। ये दरअसल उस पितृसत्तात्मक और पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के प्रमाण हैं, जिनसे अभी तक भी आजकल की लड़कियों की स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं हो रही। उन्ही के जवाब में नीलू शेखावत जी ने कुछ लिखा है। पढ़ा जाना चाहिए जरूर।
महिलाएं अब भी सैंकड़ों वर्ष पुराना पहनावा पहन रही हैं। वे आज भी साड़ी पहनकर खेत में काम करती हैं, घाघरा ओढ़नी में स्कूटी राइड कर रही हैं, घूंघट करके कार चलाकर ऑफिस जा रही हैं। पुराने पहनावे के साथ आधुनिक युग में ढलना इत्ता भी आसान नहीं जितनी आसानी से तुम्हारी लिपनी (जीभ) हिलती है।
पर तुम होनहारों ने क्या किया? क्यों कान की मुर्कियां निकाल दीं, जो एक वैदिक संस्कार है, क्यों पैरों से मोजडी निकालकर प्लास्टिक के लिपतर घसीटने लगे और ग्रामोद्योग को चौपट किया? क्यों खादी की बंडी और लठ्ठे की धोती छोड़कर पतलून बुशर्ट पर आए जो हमारे मौसम के जरा भी अनुकूल नहीं? कह दो कि यह पहनावा तो ऋषि-मुनियों का है!
और तुम फेसबुक पीढ़ी तो किस मुंह से ही बोलते हो तुम जब टंटियों से ऊपर जींस खाँसते हो या कमर से नीचे जींस ठासते हो तो महिलाओं को भी कोफ्त होती है तब तुम्हें संस्कार याद नहीं आते? आज रेड बुक में दर्ज करने लायक कुछ है तो वह है पुरुषों का पारंपरिक पहनावा! खुशकिस्मती से कुछ वयोवृद्ध बाबा दादा अभी आंखों को सुकून के लिए बचे हैं इसलिए नई पीढ़ी धोती, साफा, बंडी, सदरी और मुरकी जानते हैं वरना तुमने तो लुटिया डुबो दी। तुम औरत की बिंदी की बात करते हो, तुम्हें तिलक छोड़े कितनी पीढ़ियां हुईं?
और तुम फेसबुक पीढ़ी तो किस मुंह से ही बोलते हो तुम जब टंटियों से ऊपर जींस खाँसते हो या कमर से नीचे जींस ठासते हो तो महिलाओं को भी कोफ्त होती है तब तुम्हें संस्कार याद नहीं आते? आज रेड बुक में दर्ज करने लायक कुछ है तो वह है पुरुषों का पारंपरिक पहनावा! खुशकिस्मती से कुछ वयोवृद्ध बाबा दादा अभी आंखों को सुकून के लिए बचे हैं इसलिए नई पीढ़ी धोती, साफा, बंडी, सदरी और मुरकी जानते हैं वरना तुमने तो लुटिया डुबो दी। तुम औरत की बिंदी की बात करते हो, तुम्हें तिलक छोड़े कितनी पीढ़ियां हुईं?
औरत के मंगलसूत्र की बात करते हो जबकि तुम्हारी जनेऊ तुम्हारे दादा परदादा के साथ ही चली गई। महिलाओं के खुले बालों से चिंतित हो, पर अपनी चोटी कब की कटवा ली। बड़ी घाघ कौम हो भई तुम पहले तुम खुद भारतीय पुरुष बन जाओ महिलाएं तुमसे काफी बेहतर स्थिति में हैं।
नीलू शेखावत (संकलनकर्ता - डा. प्रशांत कुमार)
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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