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बिना जीवन साथी एक महिला का जीवन

क्या महिलाओ की जीवन जीने के लिए जीवन साथी की आवश्यकता है? क्या वह खुद से अच्छा जीवन नहीं जी सकती हैं? 
जी हां, महिलाएं अकेले भी बहुत अच्छा जीवन जी सकती हैं। मैंने तो जिया है। मैंने भी आजीवन विवाह नहीं किया है और अब मैं तिरपन वर्ष की हूँ। मुश्किलें ज़रूर आईं पर मैंने मज़बूती से उनका मुक़ाबला किया। पढ़ाई पूरी होने के बाद जल्दी ही मैं अपने पैरों पर खड़ी हो गई। इस मामले में भी मैं भाग्यशाली रही कि फर्स्ट अटेम्पट में ही मुझे सरकारी नौकरी मिल गई। जीवन में कई चुनौतियां भी आईं पर उनको पूरी हिम्मत से फेस किया है मैंने। आसान नहीं था ये सफ़र। अरेंज मैरिज करने के लिए मैंने मना किया (मेरे ख्याल से लड़कों और लड़कियों दोनों को ही या तो लव मैरिज या मैरिज बाय चॉइस ही करनी चाहिए), तो मेरे पापा बोले कि फिर अकेले रह कर दिखाओ। सरकारी आवास के लिए आवेदन किया, उसके बाद उसमें रहने भी लगी। उसमें रहना भी आसान नहीं था। शाम को रात भर की इम्मिग्रेशन अफसर की ड्यूटी के लिए इंटरनेशनल एयरपोर्ट जाती थी और सुबह लौटती थी। अड़ोसी पड़ोसी मेरे चरित्र के बारे में उल्टा सीधा बोलते थे और अपने बच्चोँ को सिखाते थे कि यह आंटी खराब है । बच्चे कई बार रास्ते में मेरे उपर कुछ पेड़ों की लकड़ियां /छोटी टहनियां या कंकड़ पत्थर फ़ेंका करते। किसी काम से कभी किसी पड़ोसी की डोर बेल बजा देती थी तो दरवाजा खोलते ही बंद कर देतीं थीं वे महिला यह सोच कर कि शायद ये बाँझ है। मुझसे तो एक आध ने पूछ भी लिया कि आपके बच्चे कहाँ हैं तो मैंने जवाब दिया था कि मेरी तो शादी ही नहीं हुई तो बच्चे कहाँ से लाऊं। लोग फिर भी कन्फ्यूज्ड रहते थे क्योंकि मैं एक बड़ी सी बिंदी लगाया करती थी और मेरी यूनिफॉर्म साड़ी थी। इसके अलावा मैं निजी जीवन में भी सलवार सूट या चूड़ीदार सूट ही पहनती थी। ट्रॉउज़र या वेस्टर्न फॉर्मल या कैज़ुअल कम ही पहनती थी वह भी तब जब मैं अपने पेरेंट्स के यहाँ होती थी। मुझे दुख ज़रूर हुआ था इस सोच से, पर मैंने परवाह नहीं की। मुझे अपनी जॉब करनी थी और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी थी। कई पुरुषों ने मुझे अवेलेबल भी समझा पर मैंने सबको सीधा कर दिया कभी सख्ती से तो कभी अपनी सूझबूझ से तो कभी कभी आत्म रक्षा में हाथ उठा कर। ईव टीज़र्स व मोलेस्टर्स व स्टॉकर्स को तो मैंने हमेशा ही आड़े हाथों लिया है। अगर सीधी तरह से नहीं सुधरे तो लोकल पुलिस की मदद भी ली है । शुरु से ही मैं बहुत स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी रही हूँ। अपने ढंग से जीना मुझे पसंद है बावजूद इसके मैं भारत की परंपरावादी सोच (ट्रेडिशनल थिंकिंग ) व जीवन मूल्यों (वैल्यूज़) का समर्थन करती हूँ और साथ ही साथ अपने नए तरह के विचारों व आधुनिक जीवन शैली को बढ़ावा देना पसंद करती हूँ। संकुचित सोच कभी नहीं रखी मैंने। मैं अपनी पसंद का (टेस्टी व हेल्दी) खाना खाना पसंद करती हूं । अच्छी किताबें ( ग़ज़ल/कविता/कहानी/ उपन्यास) व उम्दा फ़िल्में /नाटक/नृत्य नाटिका पसंद हैं। पुरानी फिल्मों का गीत- संगीत, ग़ज़लें, भजन, क्लासिकल या सेमी/लाइट क्लासिकल संगीत, शास्त्रीय नृत्य, लोक गीत संगीत व नृत्य भी काफी पसंद है । नई नई भाषाएं सीखना अच्छा लगता है । भीड़ भाड़ से दूर रहना अच्छा लगता है । दोस्त बहुत कम लोग हैं मेरे। अंतर्मुखी हूँ पर आत्मविश्वास भरपूर है। अकेले ही फ़िल्में देखी हैं, कई जगह घूमने गई थी, रेस्त्रां में खाना खाया है, प्रदर्शयों व मेलों का आनंद लिया है। मैं अपनी पसंद का (टेस्टी व हेल्दी) खाना खाना पसंद करती हूं । अच्छी किताबें ( ग़ज़ल/कविता/कहानी/ उपन्यास) व उम्दा फ़िल्में /नाटक/नृत्य नाटिका पसंद हैं। पुरानी फिल्मों का गीत- संगीत, ग़ज़लें, भजन, क्लासिकल या सेमी/लाइट क्लासिकल संगीत, शास्त्रीय नृत्य, लोक गीत संगीत व नृत्य भी काफी पसंद है । नई नई भाषाएं सीखना अच्छा लगता है । भीड़ भाड़ से दूर रहना अच्छा लगता है । दोस्त बहुत कम लोग हैं मेरे। अंतर्मुखी हूँ पर आत्मविश्वास भरपूर है। अकेले ही फ़िल्में देखी हैं, कई जगह घूमने गई थी, रेस्त्रां में खाना खाया है, प्रदर्शनीयों व मेलों का आनंद लिया है। मेरे विचार में आधुनिक होना, छोटे कपड़े पहनने या अपना शरीर का प्रदर्शन करने में या सिगरेट/शराब/ड्रग्स/फ्री सेक्स करने में नहीं है, बल्कि एक गांव या छोटे शहर में कम संसाधनों में भी पढ़लिखकर संघर्ष कर के अपने परिवार और समाज को आगे बढ़ाने में है, अपने चुने हुए क्षेत्र में नाम और इज़्ज़त कमाने में है। (यह दोनों उपरोक्त बातें मैं लड़के व लड़कियों दोनों के लिए समान रूप से कह रही हूँ।) मॉडर्न वह नहीं है जो आधुकनिकता के नाम पर जो मन आए सो करे मगर वह है जो किसी मंच पर किसी समसामयिक या सामाजिक विषय पर अपने विचार रख कर कोई वाद विवाद प्रतियोगिता जीत सके।मॉडर्न वह लड़का या लड़की है जो दहेज जैसे दानव को पटक सके। मॉडर्न वह लड़का या लड़की है जो दहेज जैसे दानव को पटक सके। मॉडर्न वह लड़की है जो कह सके कि मैं किसी भी लड़के के साथ पकड़ुआ बिआह (बिहार में प्रचलित एक तरह का विवाह जिसमें कि लोग दहेज़ देने से बचने के लिए लड़के का अपहरण करते /करवाते हैं और अपनी लड़की का विवाह उस लड़के से जबरन बंदूक की गोली की नोक पर करवा देते हैं) नहीं करूँगी, क्योंकि मैं पढ़ना लिखना चाहती हूँ और फिर अपनी काबिलियत के हिसाब से जॉब और पति पाना चाहती हूँ। मॉडर्न वह लड़की है जो कि पढ़े लिखे और काम करे, अपने बुज़ुर्ग पिता की मदद करे उनकी जिम्मेदारी में हाथ बंटाए, ज़रूरत पड़ने पर कार चला सके, अपने फाइनेंसेज़ को हैंडल करना जाने और हॉस्पिटल के चककर लगा कर अपने बीमार पेरेंट्स का इलाज कराना जाने। पैसे मैनेज करना, ड्राइव करना, आत्मविश्वास से किसी भी परिस्थिति का सामना करना (ज़रूरत पड़ने पर अकेले भी) सभी को आना चाहिए। मॉडर्न वह लड़का है जो खाना बनाने, कपड़े धोने या घर की साफ़ सफ़ाई करने में शर्म न महसूस करे। ये सब बेसिक लाइफ़ स्किल्लस् हैं जो सबको आनी चाहिएं । मॉडर्न वह लड़का है जो कि बेबी की फीड तैयार करने में या उसका डायपर चेंज करने में हिचक न महसूस करे। जो लोग अपनी मेहनत,लगन और प्रतिभा तीनों के बल पर आगे बढ़ने का प्रयास करते रहते हैं उन्हें पैसे तो मिलते ही हैं खुशी भी मिलती है कि उन्होंने अपने बल बूते पर (अपने संघर्ष की वजह से) कुछ किया। यह संघर्ष ही इंसान को मज़बूत बनाता है। हमें अपने बड़ों को सम्मान देना चाहिए, छोटों का लिहाज़ करना चाहिए और समाज में महिलाओं की इज़्ज़त को सुनिश्चित करना चाहिए। महिलाओं का भी कर्तव्य है कि वे पुरुषों को उचित सम्मान दे सकें। पुरुष व स्त्रियों को प्रकृति ने भिन्न बनाया है परन्तु हमें दोनों तरफ से इस भिन्नता की रेस्पेक्ट करनी होगी। नारी बच्चों के लिए सहानुभूति, करुणा, ममता आदि का प्रतीक है तो पुरुष भी उनके लिए शारीरिक बल, सुरक्षा, दिगदर्शन व अनुशासन का। समाज को यह सच्चाई स्वीकार करनी ही चाहिए / पड़ेगी । इसी तरह विधवा सिंगल औरतें भी कभी कमज़ोर नहीं होती हैं । मेरी दादीजी 1943 में पैंतालीस साल की आयु में विधवा हो गईं थीं। हमारे पैतृक गांव में रहते हुए भी उन्होंने बड़ी मेहनत से अकेले ही अपने सात बच्चोँ को पाला, पढ़ाया और सेटल किया क्योंकि दादाजी की मृत्यु के समय नौ भाई बहन (मेरे पापा की पीढ़ी) में से केवल दो ही सेटल हुए थे। वे बड़े ही जीवट वाली मेहनती और दबँग महिला थीं। उन्होंने अपने बेटों को बड़े अनुशासन से पाला और बेटियों की भी बहुत अच्छी परवरिश की। इंसान को वक़्त के हिसाब से खुद को बदलना आना चाहिए। मेरे ख्याल से परंपरा व आधुनिकता का समन्वय ज़रूरी है । मैंने अपनी दादी को इस बात को अमल में लाते देखा था। मैंने भी वक़्त के साथ नई टेक्नोलॉजी को अपनाया है। कम्प्यूटर्स व स्मार्टफोन्स चलाना मैंने खुद ही सीखा है ट्रायल एंड एरर मेथड से। इंसान को वक़्त के हिसाब से खुद को बदलना आना चाहिए। मेरे ख्याल से परंपरा व आधुनिकता का समन्वय ज़रूरी है । मैंने अपनी दादी को इस बात को अमल में लाते देखा था। मैंने भी वक़्त के साथ नई टेक्नोलॉजी को अपनाया है। कम्प्यूटर्स व स्मार्टफोन्स चलाना मैंने खुद ही सीखा है ट्रायल एंड एरर मेथड से। आज मैं एक सेंट्रल पुलिस आर्गेनाइजेशन की रिटायर्ड ऑफिसर हूँ। मेरे पास इज़्ज़त से जीने के लिए बहुत सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट्स हैं। समय बिताने के लिए बहुत कुछ अच्छा लिखती हूँ । मेरा विचार है कि अपने अनुभव से कुछ लिखूँ/कहूँ जिससे कि युवा प्रीढ़ी में शक्ति का संचार हो और वे अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकें। कोई भी अकेला नहीं होता और नारी जो स्वयं शक्ति स्वरूपा है, वह तो साक्षात माँ है चाहे वह अविवाहित ही क्यों न हो, क्योंकि छोटे भाई बहनों के लिए ममता तो एक पांच छह बरस की बच्ची में भी होती है । मैं स्वयं एक बड़ी बहन हूँ और यह बात दावे के साथ कह सकती हूँ। मैं ऐसी घरेलू माँओं को भी जानती हूँ जो कि दोपहर को खाना खा कर सो जातीं और उनके बच्चे स्कूल, कॉलेज से आकर ठंडा खाना ही खाते, वे परवाह ही नहीं करतीं, ऐसी भी देखीं हैं जो कि ज़रा सा सर दर्द होने पर बिना बच्चों के लिए खाना बनाए ही सो जातीं और बच्चे पढ़ कर आते तो खुद ही सादा परांठा बना कर सिर्फ़ अचार से खाते। सिर्फ़ जन्म देने भर से कोई माँ नहीं हो जाता है । बच्चों के लिए कष्ट उठाने पड़ते हैं । मेरी माँ वर्किंग लेडी थीं और बहुत केयरिंग माँ थीं। वे मेहनती थीं और हमारी एक्स्ट्रा केयर करती थीं चाहे इसकी वजह से उनको कितना भी कष्ट उठाना पड़े। ईश्वर मेरी स्वर्गीया माँ को अपनी लाडली बना कर रखें और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। मैं ने कई बार सुबह सुबह बाथरूम तक गए बगैर अपने छोटे भाई बहन के लिए नाश्ता भी बनाया और टिफिन बॉक्स के लिए भी कुछ बना कर पैक किया है । बाद में जब मैं कॉलेज/युनिवर्सिटी में पढ़ती थी या जॉब करने लगी तब भी कई बार ऐसा किया है। ये मेरा कर्तव्य था क्योंकि कई बार माँ की तबियत ठीक नहीं होती थी और वैसे भी पहली संतान होने के नाते माँ की हर तरह से मदद और सेवा करना मेरा फ़र्ज़ बनता था। लेखिका मनीषा जी की अनुमति से कोरा से साभार मैं कोरा के अपने उपरोक्त उत्तर को antarsambandh.blogspot.com पर साझा करने की अनुमति देती हूं। - मनीषा चतुर्वेदी (29.08.2023) )

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