नीलकंठ/युरेशिया
बड़ौत। तहसील क्षेत्र के बिजरौल गांव में बुधवार को गांव के सचिवालय ग्राम पंचायत बिजरौल में आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के अवसर पर क्रांतितीर्थ क्रांतिधरा के बलिदानियों को नमन कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत क्रांतिधरा बागपत के अमर बलिदानी/क्रांतिकारियों की पावन धरा की मिट्टी को नमन कार्यक्रम में विभिन्न प्रबुद्धजनों ने भाग लिया।
विवरण
कार्यक्रम का आयोजन क्रांतितीर्थ अमृत महोत्सव आयोजन समिति के तत्त्वावधान में किया गया, जिसमें जिले के लोगों ने बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया। कार्यक्रम में पहुंचे प्रांत संयोजक अश्वनी त्यागी ने कहा कि हमें क्रांतिकारियों के बलिदान को भूलना नहीं चाहिए उसे हमेशा याद रखना चाहिए। उन्हीं के बलिदान की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। हृदय में देशभक्ति का ज्वार और आंखों में शहीदों के लिए सम्मान के आंसुओं की धार के बीच बुधवार को क्रांतिवीरों को याद करके वह सभी लोग भावविभोर हो उठे और शहीदों के गांव की मिट्टी की महक महसूस कर रहे थे।
जानकारी के मुताबिक जनपद बागपत के बिजरौल गांव में स्थित सचिवालय ग्राम पंचायत बिजरौल विकासखंड बड़ौत के प्रांगण में आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के अवसर पर क्रांतितीर्थ क्रांतिधरा के बलिदानों को नमन श्रंखला के अंतर्गत क्रांतिधरा बागपत के अमर बलिदानी क्रांतिकारियों की पावन धरा की मिट्टी को नमन कार्यक्रम का एक वृहद आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता अशोक चौधरी ने कहा कि "भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था, एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आजादी के लिए 1857 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई। वस्तुतः भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है। भारत की धरती के जितनी भक्ति और मातृ भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर मिटने की जो भावना उस समय थी आज उसका नितान्त अभाव हो गया है। वहीं दूसरी ओर कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता अश्वनी त्यागी माछरा प्रांत संयोजक, अशोक सोम प्रदीप दली भगवान तोमर आदि सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए प्रांत संयोजक अश्वनी त्यागी माछरा ने कहा कि "बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर और इंजीनियर जरूर बनें, लेकिन उससे पहले हर एक को पहले भारतीय बनना चाहिए। हर बच्चे को अपने इतिहास के बारे में भी जानकारी रखनी चाहिए। क्रांतिकारियों के बलिदानी इतिहास को जानबूझकर इतिहास से विलुप्त किया जा रहा है। जिन बलिदानी क्रांतिकारियों को इतिहास से निकाल दिया गया है उन्हें उचित स्थान देने हेतु अनेक प्रकार के कार्य किए जा रहे हैं। इस दौरान कार्यक्रम में 1857 की क्रांति में शहीद हुए अमर शहीदों के वंशजों को भी पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में संस्कृति से ओतप्रोत कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। प्रांतीय संयोजक अश्वनी त्यागी ने अमर शहीद बाबा श्यामल की प्रतिमा पर दीप प्रज्वलित कर एवं पुष्प अर्पित करते हुए कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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