सोशल मीडिया जैसे जैसे हमारी आवश्यकता बनता जा रहा है वैसे वैसे इसका उपयोग सावधानी से करने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, क्योंकि यहां व्यक्तिगत कुछ भी नहीं होता।
आप उपरोक्त दावे को अपनी ही गतिविधियों के दौरान परख सकते हैं। आप देखेंगे कि अनेक बार जब कभी हम पोस्ट करते हैं अथवा किसी पोस्ट पर टिप्पणी करते हैं तब खीझ या गुस्से में स्थिति व्यक्तिगत हो जाती है जो कि सामाजिक संबंधों और सामाजिक मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से अनुचित होती है जिसका पता तत्काल नहीं हो पाता है।
मेरे एक मित्र की फेसबुक पर की गई एक पोस्ट पर हैरान कर देने वाली टिप्पणियां थीं। पोस्ट न तो व्यक्तिगत थी और न ही किसी के लिए अभद्र, किंतु पॉलिटिकल जरूर थी। उस पर ये टिप्पणियां
थीं -
१. आप शिजोफ्रेनिया से पीड़ित हैं।
२. आपको अपच है।
३. आपको कायम चूर्ण से लाभ नहीं हुआ क्या?
४. आपका ब्रेन वाश हो गया है। इत्यादि.....!
इतना ही नहीं.....
एक व्यक्ति जो लंबे समय से कोई टिप्पणी नहीं कर रहा था, वह इन समस्त टिप्पणियों को लाइक कर रहा था।
एक दो और भी ऐसे होते है जो सिर्फ लाइक करने ही आते हैं, ऐसी टिप्पणी को जिसमें आपके विरुद्ध व्यक्तिगत टिप्पणी हो। यह सब उत्प्रेरण का कार्य करता है। हम लोग इसको प्रारंभ में तो सामान्य रूप से लेते हैं, लेकिन इनके प्रभाव बहुत दूरगामी होते हैं। आपका समय और मानसिक ऊर्जा दूषित होती है। तनाव मिलता है और अंततः अपमानजनक स्थिति तक उत्पन्न हो सकती है।
ऐसी गतिविधियां करने वाले ट्रॉलर्स कहलाते हैं और ऐसे अनजान लोगों में ज्यादातर किसी पार्टी के आईटी सेल से जुड़े लोग होते हैं, लेकिन आपके ऐसे पड़ोसी, सहकर्मी, रिश्तेदार भी धीरे धीरे इसमें शामिल होने लगते हैं जिनका संबंध किसी राजनेता से या पार्टी से तो नहीं होता, लेकिन वो सभी जैसे जैसे बहस आगे बढ़ती है पर्सनल होते चले जाते हैं। अंत में यह व्यक्तिगत होकर छींटाकशी में बदल जाती है।
ऐसी स्थिति आज सर्वत्र हो गई है। विविध गुटों में बंटे लोग आपस में मित्र बन जाते हैं, जो सिर्फ विरोधी का विरोधी मित्र वाले फार्मूले से अस्थाई बने होते हैं। ये अनजान लोगों से मित्रता बाद में घातक हो सकती है। इस स्थिति को प्रश्नोत्तरों के मध्यम से मैं स्पष्ट करना चाहूंगा।
उपयोगी प्रश्न व उनके उत्तर
प्रश्न १. क्या ऐसे लोग किसी से लाभान्वित होते हैं?
उत्तर ....बिलकुल नहीं, आईटी सेल वैन को छोड़ कर ज्यादातर नहीं होते।
प्रश्न २. क्या ऐसे लोग किसी नेता या दल से जुड़े व्यक्ति के रिश्तेदार होते हैं?
उत्तर:...ज्यादा नहीं किंतु एक दो गोत्र/जातिगत/कार्य संबंध के कारण जुड़े हो सकते हैं।
प्रश्न ३. तो ये क्यों व्यतिगत प्रहार करते हैं?
उत्तर: बहस जब बढ़ने लगती है तब तार्किकता के अभाव में ऐसे लोग पराजय की स्थिति से बचने के लिए व्यक्तिगत हो जाते हैं। व्यक्तिगत कुंठा, पहचान की समस्या, संवेगों पर नियंत्रण का अभाव, सामाजिकता का अभाव, पूर्व विफलताएं, व्यक्तिगत दुर्भावना, पुराना कोई इश्यू, पूर्व में बनी धारणा, पूर्वाग्रह से युक्त होना इत्यादि में से एक या अधिक कारण हो सकते हैं।
प्रश्न ४. क्या ऐसा होना अथवा यह साधारण बात है?
उत्तर: बिलकुल नहीं.... यह न केवल सोशल मीडिया पर एथिक्स कमजोर करता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत नुकसानदायक होती है। यह स्थिति आंतरिक मनोभावों को व्यक्त करती है।
प्रश्न ५. ऐसा अंजान लोग क्यों करते हैं?
उत्तर: माइंड सेट सोशल मीडिया से बदल चुका है और हरेक इश्यू में वहां लोग एक ही तरीके से एक ही दृष्टिकोण से सोचते हैं। उनको लगता है कि वो जिसके साथ हैं या जुड़े हैं उसको नहीं खुद उनको चोट पहुंचती है। यह एक किस्म का मनोविज्ञान बन चुका है।
प्रश्न ६. क्या इसमें बदलाव संभव है?
उत्तर: कोई भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसका व्यवहार एब्नॉर्मल हो चुका है और वो भाषा का गलत प्रयोग ही हिंसक तरीके से करता है। इसलिए यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक कि पर्सनल गलतियां नहीं बताई जाएं।
प्रश्न ७. क्या दबाव इसे रोका जाना या उलाहना देने से बदलाव संभव है?
उत्तर: नहीं, वो आपसे कन्नी काटने लगेंगे, लेकिन बदलेंगे नहीं, जब कभी मौका मिलेगा पूरी ताकत से प्रहार करेंगे। वास्तव में रोकना उसको बढ़ावा देने जैसा है। केवल और केवल पर्सनल टच दे कर भावनाएं बता देने से संभव है बदलाव हो अन्यथा नहीं।
प्रश्न ८. क्या ऐसे लोगों को अनफ्रेंड करना एक हल है?
उत्तर: बिलकुल, अपरिचित को अनफ्रेंड कीजिए। परिचित जहां अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, वे कहीं और मनोवैज्ञानिक भड़ास निकलेंगे।
इसलिए समय समय पर सोशल मीडिया से ब्रेक लेना चाहिए और बहस से यथासंभव बचना चाहिए।
रचयिता - जे आर गुर्जर (सहायक आचार्य, समाजशास्त्र)
स्वामी विवेकानन्द राजकीय महाविद्यालय, खेतड़ी (राज.)
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