कोरोना के संकट काल मे लोग लॉक डाउन के नियमों का पालन करते हुए अपने घरों में सुरक्षित है। इस दौरान पिछले एक महीने में देश के विभिन्न हिस्सों में कई घटनाएं घटित हुई है। जिन में सबसे परेशान कर देनी वाली तीन बड़ी घटनायें चर्चा में रही। एक दिल्ली में हुए तबगिली जमात के सम्मेलन से सम्बंधित थी इस वजह से कोरोना मरीजो की संख्या में बड़ी और इनके सम्पर्क में जो लोग आए वो भी प्रभावित हुए। वही अगर बात करे दूसरी घटना की तो वो बांद्रा स्टेशन पर अचानक हज़ारो की संख्या में एकत्रित हुए लोगो की ये वे लोग थे जो मजदुरी, दिहाड़ी के लिए घर से बाहर आए हुए थे, और अपने घर जाने के लिए उतावले हो रहे थे। वही तीसरी घटना नजर डाले तो ये घटना विचलित कर देने वाली एवं मानव सभ्यता को तार तार के दिया ये घटना महाराष्ट्र के ही पालघर में हुए साधुओं की भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गई। निश्चित रूप से तीनों ही घटनाएं देशव्यापी बहस का हिस्सा बनी। लेकिन देखने लायक बात ये है कि इन तीनो घटनाओं में बारीकी से अध्यनन करे तो एक सामान्य सूत्र सामने निकल कर आता है, जो है अफवाहों का दौर। देश - जब विकट परिस्थिति में है और हम न केवल स्वास्थ सुविधाओ के मामले में बल्कि जागरूकता के मामले में भी अन्य पश्चिमी देशों के सामने कहीं नहीं टिकते। अभी तक कोरोना के टेस्ट के मामलों में हम अंतिम पंक्ति में है। जब तक टेस्ट नहीं होंगे तब तक स्थितियां सामने नहीं आएगी। यदि आंकड़ों और नजर डाले तो स्थितियां और भी बिगड़ती जा रही है। बावजूद इसके माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता के मनोबल को बढ़ाने हेतु समय समय पर जनता के साथ संवाद किया और अपना संदेश दिया।
हालांकि ऐसा लगता है कि इस देश मे सामान्य समझ की इतनी कमी है कि शिक्षित वर्ग ने भी सोशल मीडिया पर ताली थाली के ध्वनि विज्ञान और दिया- मोमबत्ती के ऊष्मा विज्ञान द्वारा कोरोना वायरस को मारे जाने के भिन्न भिन्न वैज्ञानिक कुतर्क प्रस्तुत कर बुद्धिजीवियों के बीच प्रधानमंत्री जी के इस सकारात्मक प्रयास का उपहास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान हुई इन तीनो घटनाओं में न केवल सोशल मीडिया वरन टीवी पर 24 घण्टे हर खबर प्रकाशित करने का दावा करने और सच सामने लाने का वादा करने वाले न्यूज चैनल ने भी अफवाहों के इस यज्ञ में अपनी आहुति देते हुए इसे साम्प्रदायिक रंग देने में कोई कसर बाकी न रखी। जबकि प्रथम घटना में हमे जागरूकता की एक भारी कमी तो दूसरी घटना में बेघर व बेरोजगार हुए मजदूर श्रमिक वर्गों की मजबूरी तथा तीसरी घटना में अमानवीयता की चरम स्थिति देखने को मिली। तीनो ही घटनाओं में खुलेआम चिल्ला-चिल्लाकर टेबल पीटते हुए न्यूज चैनल के एंकरों ने इसमें एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय के शामिल होने व साजिश करने के आरोप भी लगाए। बाद की दोनों घटनाओं में तो किसी तरह के अल्पसंख्यक समुदाय के शामिल न होने की पुष्टि होने के बावजूद न किसी तरह की माफी मांगी और न ही अपनी रिपोटिंग पर खेद प्रकट किया। एक न्यूज चैनल के प्रवक्ता ने तो सारी सीमाएं लांघते हुए कॉंग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी कि इस घटना में शामिल होने का आरोप तक लगा डाला। जिसकी चहुँओर निंदा हो रही है। भारत के न्यूज चैनल और उनको सोशल मीडिया के मिल रहे सपोर्ट ने एक अस्थिरता को जन्म सा दे दिया है। निश्चित रूप से तबलिगी जमात हो या पालघर लिंचिंग की घटना, दोषियों पर कार्यवाही होनी ही चाहिए और
उसके लिए पुलिस प्रशासन व न्यायालय बखूबी अपना काम पूरी जिम्मेदारी के साथ निभा भी रहा है और आगे श्री निभाएगा। तबलिगी जमात की घटना के बाद ऐसी कई अफवाहों का दौर भी चला जिसके लिए खुद यूपी पुलिस को एक विशेष न्यूज चैनल के ऑफिसियल ट्विटर हैंडल पर जाकर उन्हें इस तरह की खबरे न प्रसारित करने की अपील करनी पड़ी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया के लिए ये एक चिंताजनक विषय है। मेरे गाँव मे लॉक डाउन की वजह से एक परिवार के सदस्यों के अनुपस्थित होने पर एक हिन्दू व्यक्ति की मृत्यु पर पड़ोस के ही मुस्लिम परिवार द्वारा उसके अंतिम संस्कार की सभी रस्मो एंव 6 साल के एक मुस्लिम बालक द्वारा मुखाग्नि दिए जाने की खबर स्थानीय स्तर पर चर्चा में रही। इसी तरह पुलिस, प्रशासन, चिकित्सक और सफाईकर्मियों में ऐसे सैकड़ों हजारों कोरोना वॉरियर्स भी है जो अल्पसंख्यक समुदायों से आते है और लगातार अपनी जान जोखिम में डालकर इस आपदा में देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहे है। सच तो ये है कि भारत केवल किसी टीवी न्यूज के स्टूडियो में नही बसता की वहाँ जो दिखाया जाए वो सच हो। भारत में न्यूज चैनलों की इस आक्रामक भूमिका को रोके जाने के लिए न केवल केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा तुरंत कठोर कदम उठाए जाने की आवश्यकता है वरन दर्शकों को भी किसी भी ऐसी प्रसारित साम्प्रदायिक खबरों पर धैर्य व संयम बरतने की आवश्यकता है। अन्यथा रवांडा देश मे एक रेडियो द्वारा प्रसारित खबर पर हुए विभत्स नरसंहार की भांति इस देश की महान, प्राचीन सभ्यता व संस्कृति पर आने वाले समय मे कहीं कोई कलंक न लग जाये।
(ये लेखक डा. प्रशांत के निजी विचार हैं।)
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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