एक भिखारी था। उसने सम्राट होने के लिए कमर कसी। चौराहे पर अपनी फटी-पुरानी चादर बिछा दी, अपनी हाँडी रख दी और सुबह-दोपहर-शाम भीख माँगना शुरू कर दिया, क्योंकि उसे सम्राट होना था। बिना यह सोचे समझे कि भीख माँगकर भी भला कोई सम्राट हो सकता है? किंतु उसे इस बात का पता नहीं था। भीख माँगते-माँगते वह बूढ़ा हो गया, तो मौत ने दस्तक दी और वह बूढ़ा भी मर गया। लोगों ने उसकी बॉडी फेंक दी, उसके सभी बिस्तर नदी में बहा दिये, जमीन गंदी हो गयी थी तो सफाई करने के लिए थोड़ी खुदाई की। खुदाई करने पर लोगों को यहाँ बहुत बड़ा खजाना गड़ा हुआ मिला। तब लोगों ने कहा कि कितना अभागा था। जीवन भर भीख माँगता रहा। जहाँ बैठा था अगर वहीं जरा-सी खुदाई करता तो सम्राट हो जाता। ऐसे ही हम जीवन भर बाहर की चीजों की भीख माँगते रहते हैं, किन्तु जरा-सा भीतर गोता मारें, योग को आत्मसात करके अंदर की शक्तियों का जागरण करें तो उस आत्मखजाने को भी पा सकते हैं, जो हमारे अंदर ही छुपा हुआ है।
विनय योगी
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें