मित्रो! मासिक उलझन सुलझन के सौजन्य से आपके समक्ष प्रस्तुत है आचार्य निखिल की एक स्वरचित कविता। आशा करते हैं कि आपको अवश्य पसंद आएगी।।
ना हूं मैं राग बैरागी
ना ही संत ना ही त्यागी
निज अभिमान से दूर नहीं मैं
प्रेम भक्ति से भरपूर नहीं मैं
फिर भी करते तुम आलिंगन हो
तुम करुणासागर जीवन धन हो।।
झूठी तृष्णा जकड़े हुए
झूठे बंधन पकड़े हुए
ना की है कभी पुकार
ना आया हूं तेरे द्वार
फिर भी प्रेम बरसाते प्रेम अयन हो
तुम करुणासागर जीवन धन हो।।
अनभिज्ञ रहा प्रेम आनंद से
उलझा रहा जीवन उलझन में
तेरी करुणा नही पहचान सका
जीवन दीप में अब प्राण कहां
फिर भी निभाते तुम प्रेम प्रण हो
तुम करुणा सागर जीवन धन हो।।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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