ग्रास रूट स्तर से पोस्ट
गुर्जर समाज के सामाजिक रीति-रिवाजों के संदर्भ में। मैं आजकल गांव में हूं । यहां रहते हुए मुझे सामाजिक रीति-रिवाजों को गहराई से समझने का मौका मिला। दो महीने के अंदर मैं अपने पिताजी और छोटे भाई को खो चुका हूं। इसका मुख्य कारण घरेलू मसले हैं। समाज के लोगों का बड़ा सहयोग रहा है और निरंतर रहा है।
इस शोक की घड़ी में उनसे सांत्वना भी मिली। यहां पर मैं सामाजिक रस्मों का जिक्र करना चाहता हूं।
रसम पगड़ी:रसम पगड़ी तेरहवीं के दिन होती है, जो (पगड़ी) उपस्थित मुअज्जिज लोगों के द्वारा परिवार के जिम्मेदार, समझदार व योग्य व्यक्ति के सर पर रखी जाती है इसका महत्व तब है जब परिवार उसकी बात को माने अन्यथा इसका कोई महत्व नहीं केवल मात्र एक फॉर्मेलिटी है।
समाज में एक परंपरागत पद नंबरदार का है जिसका मुख्य कार्य समाज के मुद्दों को सुलझाना है। मैंने देखा और महसूस किया है कि इसकी भूमिका बहुत हद तक प्रभावी रही है, लेकिन फिर वही बात कि यदि कोई परिवार नंबरदार की बात ना माने तो फिर क्या किया जाए? इतनी व्यवस्थित व्यवस्था की परंपरा के होते भी लोग कोर्ट में जाते हैं जो समस्या का समाधान नहीं है। उपरोक्त के विषय में मेरे मित्रों, अजीजों और घनिष्ठों से सुझाव आमंत्रित हैं तो केवल इस ध्येय से कि समाज द्वारा प्रभावी रूप में पूर्व की भांति सामाजिक नियंत्रण किया जा सके।
मेरा सुझाव है कि समाज द्वारा स्वतः सामाजिक नियंत्रण किया जाए तो अत्यंत प्रभावी तरीके से। उसको प्रभावी और प्रभावी बनाने के लिए संशोधन की प्रक्रिया को भी अपनाया जाए।
मेरे विचार से हर वह उपाय अपनाया जाए जिस से कि सामाजिक प्रजातंत्र स्थापित होकर सुशासन प्रभावी हो सके। और? ऐसी व्यवस्था बन सके जिसमें सभी की भूमिका स्पष्ट रूप में उभरकर सामने आए और संस्कृति का संरक्षण भी संभव हो सके। डॉक्टर महिपाल (पूर्व आई ई एस अधिकारी भारत सरकार/लेखक-चिंतक टिप्पणीकार व ट्रेनर सोशल वर्कर)
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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