दिल्ली पुलिस में हैड कांस्टेबल यजुवेंद्र ने तथा भोपाल की कराटे खिलाड़ी रीना कुमारी ने हाल ही में कनाडा में आयोजित वर्ल्ड पुलिस गेम्स में एक गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीता है। यह इनका विदेश में पहला अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाग है।
रीना म.प्र. पुलिस में कांस्टेबल हैं, पर उनकी नियुक्ति खेल कोटे से नहीं हुई। वह म.प्र. कराटे अकादमी की पूर्व प्लेयर रही हैं और वर्तमान में एसोसिएट प्लेयर हैं। अकादमी में जूनियर को सिखाती भी हैं। भोपाल से 83 किमी दूर राजगढ़ के नरसिंहगढ़ से निकलकर कनाडा में तिरंगा लहराने वाली रीना कुमारी की कहानी उन्हीं की जुबानी-
"मेरे परिवार में मां और एक बड़ी बहन है। मां नरसिंहगढ़ में ही रहती हैं, जबकि बहन मनीषा कुमारी मुंबई में मॉडलिंग करती हैं। मैंने अपने पिता को नहीं देखा। उनका निधन 1991 में मेरे पैदा होने से 3 माह पहले एक एक्सीडेंट में हो गया। था। मां ने न केवल पिता का ट्रांसपोर्ट का कारोबार संभाला, बल्कि हम दोनों बहनों के करियर बनाने में अहम भूमिका निभाई। मुझे खेल का शौक बचपन से रहा है। कराटे मैंने नरसिंहगढ़ में ही सीखा, लेकिन सुविधाएं नहीं थी। मैंने भोपाल में सीखने की इच्छा जाहिर की तो मां ने हामी भर दी। तीन माह तक मैं रोज बस पकड़कर भोपाल टीटी नगर स्टेडियम कराटे सीखने आने लगी। फिर यहीं किराए से कमरा ले लिया। म.प्र. अकादमी के ट्रायल के बाद मेरा
सलेक्शन हो गया। मैंने तीन साल यहीं मेहनत की। मेरा पहला इंटरनेशनल मेडल गोवा में 2011 में आ गया। इसके बाद मैंने नेशनल लेवल पर 5 गोल्ड, दो सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल जीते। मैंने 2012 में कांस्टेबल भर्ती के लिए कॉम्पीटिशन दिया और वहां भी सलेक्ट हो गई। पुलिस गेम्स में कराटे 10 साल बाद 2022 में शामिल हुआ। मैं दिल्ली ऑल इंडिया पुलिस गेम्स में उतरी और दो सिल्वर जीते।"
रीना की स्टोरी दैनिक भास्कर से साभार।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें