विश्व भर में बौद्धिक क्षमताओं को न्यून करने का प्रयास कब से होता आ रहा और यह सामूहिक था। आज उपलब्ध परिस्थितिजन्य तमाम साक्ष्य इसको प्रमाणित कर रहे हैं मानव मन की अस्थिरता, विचलन और निरंतर बदतर होती स्थिति को भी। ऐसे में जब भारत जैसे इंद्रियों को वश में कर लेने वाले देश की स्थिति शोचनीय है तो संपूर्ण विश्व के हाल को तो सहज ही समझा जा सकता है। आइए माहौल को समझने के लिए कुछ उदाहरणों के द्वारा स्थिति को जानने और समझने का प्रयास करते हैं।
आज एक समाचार निरंतर बदतर होती स्थिति के संदर्भ में पढ़ा कि-
जरा जानिए कि "मेरठ नगर निगम ने सुपर सकर मशीन से कराई नालों की सफाई, सफाई के बाद नहीं होगा जलभराव।"
अब, समझने की बात यह है कि यह मशीन मानवचालित है, लेकिन मानव से उत्तम परिणाम नहीं दे सकती यानि मशीन ऑपरेटर की 'सफाई प्रकृति' के अनुरूप ही मशीन भी कार्य करेगी। अब यदि इस मशीन के ऑपरेटर के दृष्टिकोण से सीमित सफाई ही पर्याप्त है तो वह उतनी ही सफाई करेगा। सच तो यह है कि सफाई निरीक्षक कितना भी काम बेहतर करना या कराना चाहे, होगा उतना और वैसा ही जैसा ऑपरेटर करना चाहेगा। यह सिर्फ एक बानगी भर है उन परिवर्तनों की जो कि गलत दिशा में हुए और निरंतर हो रहे हैं। ऐसे अनेक और असीमित साक्ष्य हैं जो हम लोगों की अकर्मण्यता का साक्षात और सिद्ध प्रमाण हैं।
कुछ और उदाहरण देखिए तो सही ज़रा -
विद्युत आधारित उपकरणों के लिए ट्रिपिंग किसी भी दृष्टि से उपयुक्त नहीं, लेकिन लगातार ट्रिपिंग विद्युत खपत को बढ़ाकर शासन के राजस्व में बढ़ोत्तरी कर सकती है और यदि शासन ऐसा न करना चाहे, लेकिन गुड बुक में रहने वाले यदि अपने स्तर से राजस्व बढ़ाने के ध्येय से ट्रिपिंग करते रहें, तब? इस ही क्रम में एक और खेल हो रहा है कि बिल जमा कर चुके उपभोक्ताओं के कनेक्शन काट दिए जाते हैं और उस संदर्भ में रसीद देखकर जोड़ तो दिए जाते हैं लेकिन उनके आगामी बिल में डिस्कनेक्टेड कनेक्शन को जोड़ने की राशि समायोजित कर दी जाती है, जिसकी कोई जानकारी उपभोक्ता को नहीं हो पाती है।
आज नवीनतम स्थिति देखिए कि अमूल दूध की आधा किलो से बड़ी सभी पैकिंग की दर एक ही कर देने से आमजन का तो नुकसान है ही कंपनी का भी है। अब इसका प्रभाव क्या होगा? आखिर सोचना आमजन को ही होगा।
इसी तरह दालों की स्थिति को समझिए कि दालें साबुत, दली हुई और धुली हुई उपभोक्ता के द्वारा प्रयुक्त की जाती हैं तो उन सबका एक ही भाव कर दिया गया है जबकि उनकी प्रोसेसिंग में तमाम काम किया जाता है तो साबुत दालों का भाव का भाव कम और प्रोसेस्ड दालों का अधिक होना ही चाहिए।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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