दर्द
दर्द के हैं रूप कितने कोई खट्टा या कसैला?
दर्द एक मीठा भी होता पर कोई होता विषैला।
इक मनोहर दर्द ऐसा साथ जीवन भर निभाता,
दर्द जो अपनों से मिलता दर्द ये देता अकेला।
दर्द के अहसास को तो जन सभी पहचानते हैं।
दर्द तो है तन या मन का इसको सब ही मानते हैं।
दर्द तन का सहन होता दर्द अन्तस है रुलाता,
धन्य वो जो हर तरह का दर्द सहना जानते हैं।
आत्मिक कष्ट
आत्मिक जो कष्ट होता नयन उसका द्वार होता।
पिघलकर वो ही मनुज के आँसुओं की धार होता।
कष्ट ये ऐसा अकेला हृदय में रहता विराजित,
प्यार की थपकी ही केवल इसका एक उपचार होता।
नाम
दिन नहीं कोई भी ऐसा जब नहीं तुमको पुकारा।
लग रहा जीने का अब तो नाम ही केवल सहारा।
नाम की महिमा निराली कह रहे हैं संत ज्ञानी,
बन गया है नाम संबल मेरे जीवन में तुम्हारा।
रचनाकार
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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