अब जब से आम जनजीवन में हम यात्रा के विविध माध्यमों के रूप में बहुत सारे माध्यमों का उपयोग करने लगे हैं, तो उनमें निजी टैक्सी का उपयोग करने में बेहद सतर्कता की जरूरत है, क्योंकि ऐसे अनेक उपलब्ध साधन हैं जो उपभोक्ता के जागरूक ना होने पर उन उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग कर यात्री को हानि पहुंचा सकते हैं। जागरूक होकर और रास्तों के विविध स्रोतों से अवगत होकर हम ऐसी प्रतिकूल स्थितियों से बच सकते हैं। अन्यथा आप, हम या सामान्य बुद्धिमता के नागरिक इतना समझ भी नहीं सकते कि उनको यानि यात्रियों को अकल्पनीय हानि सहन करती पड़ सकती है। साथ ही यातायात का माध्यम ऑपरेट करने वाला आपको गलत गंतव्य पर पहुंचाकर एक नई किस्म की समस्या उत्पन्न कर सकता है।
हमको यह जान लेना है कि ऐसे या वैसे, इच्छा से या अनिच्छा से जागरूक तो होना ही होगा।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें