धर्म नहीं है धर्मग्रन्थ का पढ़ना, सुनना माला नर्तन।
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।
धर्म-क्षेत्र है सबसे उत्तम इसकी नहीं सीमा है कोई।
धर्म गुणों की गुणवत्ता का कर नहीं सकता वर्णन कोई।
करे आत्मा की जो शुद्धि ज्ञान ध्यान आनन्द मनोहर।
हो विकास शक्ति का जिससे धर्म लेत पर पीड़ा को हर!
धर्म कर्म ये ही सब ऐसे मानव मन को करते चन्दन!
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।।१।।
हीन भावना की मनोवृत्ति, घृणा, लोभ, क्रोध, भय, माया।
कहलाते हैं अधर्म सभी ये लिपटा इनसे हर जन पाया।
क्षमाशीलता मन की शक्ति, पावन समता अभय भावना।
धर्म सभी ये कहलाते हैं, मन में पर की भली कामना।
सन्तोष, सरलता, क्रोध न करना कर्म करे जीवन को कुन्दन।
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।।२।।
विकास मित्रता का करना भी पावन धर्म सदा कहलाता।
खुद को और दूजों को सुख दे जीने की ये कला दिखाता।
सदा विकारों से मुक्ति की राह धर्म ही है बतलाता।
निर्मलता, आचरण, शांति धर्म हृदय में ला हर्षाता।
पर सेवा उपकार धर्म है सदा हरण करता पर क्रन्दन।
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।।३।।
कोई भी दुष्कर्म मनुज तो मन विकार बिन कर नहिं सकता।
मन विकार जब तक हैं सिंचित धर्म कर्म भी कर नहिं सकता।
व्यवहार कुशलता दानशीलता कहलाती है धर्म साधना।
करुण स्नेहिल भाव मैत्री दया सभी है धर्म कामना।
जाति, वर्ण या ऊँच नीच का होता नहीं
धर्म में बंधन।
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
धर्म में बंधन।
धर्म नहीं है केवल पूजन, अर्चन और ईश का वन्दन।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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