1857 की क्रांति के अमर सेनानी तथा किला परीक्षितगढ़ के अंतिम राजा राव कदम सिंह की स्मृति में क्रांतितीर्थ समिति के बैनर के तत्वावधान में आज एक कार्यक्रम राव कदम सिंह के पैतृक गांव पूठी निकट किला परीक्षितगढ़ मेरठ में प्रातः 11 बजे आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता राव कदम सिंह के वंशज श्री सुभाष सिंह ने की तथा संचालन श्री विनोद त्यागी किया, कार्यक्रम के संयोजक मनोज नागर व मनोज रावल रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री रोहताश पहलवान (पूर्व जिला पंचायत सदस्य) रहे। इस अवसर पर समिति के संयोजक अश्विनी त्यागी जी ने अपने उद्बबोधन में कहा कि भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय की ओर से 10 मई 1857 से लेकर 15 अगस्त सन् 1947 तक के क्रांतिकारियों व स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में उनके पैतृक गांव में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश हुआ है, उसी के निमित्त आज राव कदम सिंह की स्मृति में गांव पूठी में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ है। शहीदों के गांव की मिट्टी एक कलश में एकत्रित कर दिल्ली माननीय प्रधानमंत्री जी को सौंपी जायेगी तथा दिल्ली में एक भव्य स्मारक बनाया जायेगा। दूसरी ओर शहीदों के गांव में भी उनके नाम पर एक स्मारक बनेगा।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए अशोक चौधरी ने कहा कि यदि राव कदम सिंह 27 जून को बरेली से चली क्रांतिकारी सेना को गढ़ गंगा का पुल पार ना करा पाते तो दिल्ली जुलाई के पहले सप्ताह में ही अंग्रेजो के अधिकार में चली जाती।
क्रांतिकारी सेना गंगा का पुल पार न कर सके, इसके लिए अंग्रेजों ने नाव के बने पुल को तोड दिया था। परंतु राव कदम सिंह ने अपने साथ दस हजार की सेना लेकर अंग्रेजों को मार भगाया तथा नावों की व्यवस्था कर गंगा पर पुनः पुल बनवा दिया और क्रांतिकारी सेना गंगा पार कर गई। इसलिए गढ़ गंगा ब्रजघाट पर बने पुल का नाम राव कदम सिंह सेतु रखा जाना चाहिए तथा पुल के किनारे पर राव कदम सिंह की भव्य प्रतिमा स्थापित होनी
चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम अध्यक्ष श्री सुभाष सिंह ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद प्रेषित किया। कार्यक्रम में संयोजक मनोज रावल,मनोज नागर तथा राव कदम सिंह के वंशज श्री सुभाष सिंह को प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पूठी गांव के प्रधान श्री सोनू सिंह ने घोषणा की कि वो बहुत जल्द गांव में राव कदम सिंह की स्मृति में कोई स्मारक या गांव के दरवाजे पर उनका नाम अंकित करायेगे।
कार्यक्रम में रजनीश त्यागी, नरेंद्र चौहान ओमकार त्यागी सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।
सूचना स्रोत - अशोक चौधरी
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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