परिचर्चा - "जीवन भर सकारात्मक रहकर जब हम अर्थपूर्ण और गुणात्मक जीवन सफलतापूर्वक व्यतीत कर सकते हैं तो नकारात्मकता का इतना प्रभाव समाज पर क्यों?"
अंतर्संबंध ब्लॉग पर एक परिचर्चा आयोजित की गई। विषय ऊपर इंगित कर दिया गया है। जिनको सम्मिलित किया गया उनसे आग्रह किया गया कि -
कृपा कर विषय पर अपने दृष्टिकोण से अवगत कराएं।
इस संदर्भ में जिनके विचार आए वे इस प्रकार हैं।
आशा गुप्ता आशु जी का यह विचार था
मानव जीवन एक नदी की धारा है भाव और अभाव के किनारों को छूते हुए वह निरंतर बहती है। भाव होते हैं तो लोग प्रफुल्लित होते हैं, उल्लसित होते हैं लेकिन वहीं यदि अभाव जीवन में हो, चाहे वह भावनाओं का हो, चाहे वह आर्थिक हो या मानसिक या शारीरिक हो, चाहे जैसा.. किसी भी अभाव के होने पर हृदय में अपनेआप नकारात्मकता आ जाती है। ना चाहते हुए भी इंसान इसके गहरे प्रभाव में आने लगता है। मैं यह नहीं कहती कि इससे बाहर नहीं आया जा सकता, लेकिन उसके लिए अथक प्रयास की जरूरत है। साथ ही आपके आसपास का माहौल भी ऐसा होना चाहिए जो आपको इस नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले चले।
दूसरा पहलू यह है कि लोग अपने दुख से ज्यादा दूसरों के सुख से दु:खी हैं, जिसकी वजह से उन्हें निराशा घेर लेती है और उनके मन में नकारात्मक विचार आने लगते हैं। आजकल की जो जीवन शैली है उसमें मानव भाग रहा है बस। अपनी भौतिक सुखों को सहेजने के चक्कर में अपनी छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करने लगता है। एक कमजोर मन जिसमें निराशा, हताशा हो तो जाहिर है उसके मन में नकारात्मकता ही जन्म लेगी। हमारे चारों तरफ ऐसे ही कमजोर मन वाले लोग मौजूद हैं। शरीर का कमजोर होना तुरंत दिखाई दे जाता है और फिर हम उसके इलाज में जुट जाते हैं लेकिन मन का कमजोर होना बहुत देर के बाद दिखाई देता है और तब तक व्यक्ति घोर निराशा में डूब चुका होता है। इसी तरह के लोगों से मिलकर हमारा समाज बना है, बनता जा रहा है। यही वजह है कि समाज में नकारात्मकता बढ़ती जा रही है, क्योंकि लोगों के मन में न शांति है और ना संतोष और इनके अभाव में जीवन आसान नहीं रह जाता।
आज लोगों के पास खुद के लिए वक्त नहीं है दो घड़ी बैठ कर वह आत्ममंथन ही नहीं करता कि उसे क्या चाहिए? कितना चाहिए और क्यों चाहिए? जिस दिन व्यक्ति अपने मन की इन सवालों का जवाब देना सीख जाएगा, उस दिन यह नकारात्मकता धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि हम भाग रहे जिंदगी में समय-समय पर ठहर कर विचार करें, आत्म मंथन करें और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएं।
लखन तोमर जी का मत था कि
Simply because negativity sells better. और!आज वाणिज्य का युग है जब हर आभास, आचरण और एहसास का मूल्यांकन अर्थ के समकक्ष ही किया जाना है तो किसी भाव या दृष्टिकोण की saleability प्रथम मायने रखती है। आप किसी की प्रशंसा को प्रयास कर के भी वैसा व्यापक स्वरूप नहीं दे सकते जैसा उस की एक बुराई को … नेहरू जी जैसा इतिहासकार , उनके जैसा दूर दृष्टा, उनके समकक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों वाला शायद उनका समकालीन कोई दूसरा राजनीतिज्ञ नहीं है, जो प्रायः भारत की प्रगति का मूल है और जिस कारण विश्व में उनकी ख्याति है - किन्तु आप किसी भी ऐरे-ग़ैरे से बात कर लीजिए वो उन्हें लेडी माउंटबेटन के साथ जोड़कर चरित्रहीन घोषित करने में एक मिनट भी नहीं लगायेगा … यह है वास्तविकता !
सेवानिवृत्त आई.ए.एस. आदर्श जैनर जी के अनुसार,
सभी प्रकार के दुखों का मूल कारण हम तीन आयामों में समझ सकते हैं-अज्ञान, अभाव और अशक्ति। अज्ञान के चलते मनुष्य प्रकृति व प्रवृत्ति दोनों को समझ नहीं पाता। अभाव मनुष्य को आवश्यक अनुभवों से वंचित रखता है और अशक्ति के कारण मनुष्य चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। दिन-प्रतिदिन यह देखने को मिलता है कि सही जानकारी ना होने के कारण मनुष्य गलत कार्य को करता है या फिर सही कार्य को भी गलत तरीके से करता है। दोनों ही परिस्थितियों में अज्ञान ही उसकी गलतियों का कारण सिद्ध होता है। जैसे एक गरीब आदमी सदैव इसलिए गरीब नहीं रहता क्योंकि वह मेहनत नहीं करता, परंतु वह गरीब इसलिए रहता है क्योंकि उसे किस क्षेत्र में मेहनत करनी है, इस बात की जानकारी नहीं होती। एक मजदूर दिन भर शरीर-तोड़ मेहनत करने के बाद भी ₹400 से ₹500 प्रतिदिन कमा पाता है परंतु वहीं एक ठेकेदार एक दिन में 5,000-10,000 या फिर इससे भी ज़्यादा पैसे कमा लेता है, क्योंकि उसने उस प्रकार के काम को चुना है जहां पैसे का लेन देन ज़्यादा होता है।
अब आइए अभाव पर। किसी भी पदार्थ का अभाव मनुष्य को उससे जुड़े अनुभवों से वंचित रखता है। पैसे का एकमात्र उपयोग हमें पदार्थ उपलब्ध कराने में है और उन विभिन्न प्रकार के पदार्थों के उपयोग और उपभोग से हम नए-नए प्रकार के अनुभव ग्रहण करते हैं। इसलिए जब भी किसी विषय वस्तु या व्यक्ति का अभाव हमारे जीवन में होता है तो उससे जुड़े अनुभव हम ग्रहण नहीं कर पाते। अक्सर देखा गया है कि पैसे के अभाव में लोग चोरी, बेईमानी, हेरा-फेरी इत्यादि करते हैं। हां! यह भी देखा गया है कि धनी संपन्न भी चोरी, बेईमानी, हेराफेरी आदि करते हैं, परंतु उनके इस अनुचित व्यवहार का कारण धन के अभाव से अधिक उनकी अज्ञानता होती है। जिसके चलते वह सही और गलत में अंतर या भेद नहीं कर पाते।
दुख का तीसरा कारण अशक्ति कहा गया है। अशक्ति यानि के दुर्बलता । शक्तिहीन व्यक्ति, चाहे वह अशक्ति धन की हो चाहे वह अशक्ति तन की हो या फिर मन की हो, सभी प्रकार की अशक्ति मनुष्य के जीवन में दुख का बीजारोपण करती है । इसलिए मनुष्य का सदैव यही प्रयास रहना चाहिए कि वह तन, मन, धन इन सब प्रकार की दुर्बलताओं का निराकरण करें और अपने जीवन को शक्ति से परिपूर्ण करें। एक बात और समझने योग्य है कि अज्ञान, अभाव और अशक्ति इन तीनों का जुड़ाव मनुष्य के अनुभवों से है । यह तीनों चीजें मनुष्य के अनुभव की पोटली की पूर्णता या अपूर्णता को सुनिश्चित करते हैं । इसलिए संपूर्ण मानव जीवन का सतत प्रयास, सदैव अज्ञान, अभाव और अशक्ति को दूर करने में ही होना चाहिए । इस प्रकार के प्रयास से ना केवल व्यक्ति, परंतु परिवार, समाज, राष्ट्र और अंत में सारा विश्व, सुख के पथ पर अग्रसर रहता है।
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