सकारात्मक भाव सदा ही, मानव जीवन में रंग भरते। जीवन में आगे बढ़ने को, भाव सदा ये प्रेरित करते।।
ऐसा मनुष्य कोई न जग में, जिसमें कोई गुण न पाया।
लेकिन माया का रंग ऐसा, इन्हीं गुणों पर चढ़ता पाया।।
अर्थपूर्ण सब ही गुण होते, जान नहीं पर मानव पाता।
ज्यादा पाने के चक्कर में निज गुण से वंचित रह जाता।।
इसीलिए भूखे रहते हैं कभी ।पेट नहीं उनके भरते।
जीवन में आगे बढ़ने को, भाव सदा ये प्रेरित करते।।१।।
मिलती नहीं सफलता जब है मन ही उसको सदा नकारे।
नकारात्मक भाव ।हृदय को मिल जाते हैं मथते सारे।।
साकार स्वप्न तब ही होते हैं, जब हो सद्भावों का सृजन।
केवल सद्भावों से होता, मन के कुभावों का मर्दन।।
सकारात्मक दीप तभी ही, मानव के जीवन में जलते।
जीवन में आगे बढ़ने को भाव सदा ये प्रेरित करते।।२।।
नकारात्मकता ही देखी, जीवन में आशा को खोती।
और! निराशी बेल हृदय में, चुपचुप आकर है बोती।।
पता नहीं लगता मानव को क्यूँ आकर के छाई निराशा।
मनुष्य सोचता ही रह जाता, पड़ा दिखा क्यूं उलटा पासा।।
सजग नहीं जो रह पाते हैं, नष्ट वही जीवन को करते।
जीवन में आगे बढ़ने के भाव सदा ये प्रेरित करते।।३।।
कौन चाहता है जीवन में, पकड़े जो उलटी राहों को।
सदा सकारता हेतु वो तो, खुली रखे अपनी बाँहों को।।
हैं विधना के खेल निराले, जो चाहे वो ही होता है।
मानव का प्रयास मात्र है विधना फल दाता होता है।।
फिर भी जो प्रयास रहे कर, सफल स्वयं को वो ही करते।
जीवन में आगे बढ़ने को, भाव सदा ये प्रेरित करते।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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