गुरुपर्व के शुभ दिन पर आपको नमन करता हूँ सर।
आप सोच रहे होंगे कि जगमोहन जी तो अध्यापक नहीं थे फिर मैं उन्हें गुरु पूर्णिमा के दिन याद क्यूँ कर रहा हूँ।
इसकी वज़ह यह है कि उनके साथ तीन वर्षों में काम करके जो मैंने सीखा वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख है और इसीलिए मैं जगमोहन साहब को गुरु का स्थान देता हूँ।
मैंने उनके पास जाने से पहले गूगल पर पढ़ा था कि जगमोहन जी देश के सर्वकालिक श्रेष्ठतम ब्यूरोक्रेट हैं। इसलिए मन में बड़ी उत्सुकता थी उनको नजदीक से जानने की।
सौभाग्य से तीन वर्षों में उन्हें नजदीक से जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन वर्षों में मैंने ईमानदारी के उच्चतम स्तर को अपनी आँखों से देखा। काम को करने का उनका तरीका और विनम्र रहकर बेहद सख्त अंदाज में काम को अंजाम देते हुए मैंने आज तक उनके जैसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं देखा।
यह कर्मयोगी अब हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनके आदर्श हमेशा मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे।
राष्ट्र प्रहरी और ग्राम पाठशाला के जनक लाल बहार के विचार
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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