अवसर
दिनांक 24 जुलाई 2023 की सुबह 11 बजे क्रांतितीर्थ समिति के तत्वावधान में एक कार्यक्रम का आयोजन जिला बुलन्दशहर के निकट गुठावली कलां गांव में सन् 1857 की क्रांति में शहीद हुए इन्द्र सिंह व प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक (भूप सिंह),श्याम लाल राठी व नत्थू सिंह राठी ग्राम अख्त्यारपुर, नत्थू सिंह कपासिया ग्राम मुंडसाना, रामफल मावई ग्राम लुहारली, हरकेश सिंह ग्राम मनोहर गढी,की स्मृति में आयोजित किया गया।
स्वागतोत्सुक
कार्यक्रम की अध्यक्षता शहीद इन्द्र सिंह के वंशज श्री चरण सिंह ने तथा संचालन श्री धर्मेन्द्र राठी ने किया।
उद्बोधन
मुख्य अतिथि - जिला गौतम बुद्ध नगर के होमगार्ड जिला कमांडेन्ट श्री वेदपाल चपराणा जी।
वक्तव्य - "हम आज जो भी सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं, यह सब इन शहीदों की कुर्बानी से ही संभव हो सका है। अतः यह हमारी जिम्मेदारी हो जाती है कि हम इन शहीदों का स्मरण करते रहें तथा उनके वंशजों को आदर व सम्मान देते व दिलाते रहें। यही उन हुतात्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।"
मुख्य वक्ता अशोक चौधरी का वक्तव्य - "दिल्ली के आसपास रहने वाले लोगों ने देश के लिए अकल्पनीय बलिदान दिये हैं। जब मुगलों ने शाहजहां के शासनकाल से किसानों पर अत्याचार प्रारंभ किए, तब ही से भरतपुर के किसान ने गोकुला, राजाराम तथा सूरजमल जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया है। इसी कारण भरतपुर के राजाओं ने बुलंदशहर और अलीगढ़/कोल की सूबेदारी चंद्रभान सिंह को दी थी। भरतपुर के राजा नवल सिंह के सेनापति के रूप में सन् 1773 में चंद्रभान सिंह ने दनकौर के युद्ध में लडते हुए अपना बलिदान दे दिया था, परंतु अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के लोगों की हैसियत कम करने की कोशिश की। इसी कारण जब सन् 57 में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने जब बुलंदशहर और अलीगढ़ का सूबेदार अपने रिश्तेदार मालागढ़ के 36 गांव के छोटे से जागीरदार को बना दिया तो यहा की हिंदू शक्ति को संतुलित करने के लिए नवाब ने गुठावली के इंद्र सिंह राठी को अपना दीवान/प्रधानमंत्री बनाया, जो अंग्रेजों के साथ लडते हुए शहीद हो गए।विजय सिंह पथिक इन्हीं इन्द्र सिंह राठी के पौत्र तथा हमीर सिंह राठी के पुत्र थे। विजय सिंह पथिक/भूप सिंह देश के आजाद होने तक अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे। सन् 1912 में जब अंग्रेजों ने राजधानी कलकत्ता से दिल्ली बदली तब भूप सिंह राठी/विजय सिंह पथिक ने वायसराय पर बम फेंककर मारने का प्रयास किया तथा बिजोलिया किसान आंदोलन को अपना नेतृत्व प्रदानकर, किसान हितों के लिए लम्बा संघर्ष किया। ऐसे क्रांतिवीरों को शत-शत नमन है।"
मंतव्य स्पष्टीकरण - क्रांतितीर्थ समिति के संयोजक अश्विनी त्यागी जी ने अपने संबोधन में कहा कि "भारत सरकार सन् 1857 से लेकर सन् 1947 तक के सभी क्रान्तिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक स्मारक दिल्ली में बनाने जा रही है। उसी के निमित्त समिति के नेतृत्व में एक यात्रा मेरठ से 14 अगस्त से प्रारम्भ होकर 15 अगस्त को लाल किले पर पहुंच कर प्रधानमंत्री जी को एक ज्ञापन देगी।"
कार्यक्रम में समिति के सहसंयोजको ने भी अपने विचार रखें और समिति की ओर से सभी उपरोक्त स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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