आमजन को स्वतंत्रता और नागरिक जीवन में उसके महत्व को अवश्य समझना चाहिए। स्वतंत्रता को उसके सही परिप्रेक्ष्य में लेते हुए भारत जैसे विशाल देश में इसके दुरुपयोग से बचते हुए इसे भीड़ तंत्र में परिवर्तित होने से बचाने का प्रयास भी करना चाहिए।
किसी देश के सार्वभौमिक विकास में स्वतंत्रता की महती भूमिका होती है पर भारत के संदर्भ में दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यहां स्वतंत्रता की सीमाओं के उल्लंघन को भी हल्के भी में लिया जाता है। यही गंभीर संकट का कारण भी बन सकता है।
यह स्वतंत्रता की सीमाओं के उल्लंघन ही का परिणाम है कि विभिन्न मीडिया स्रोत आज सांस्कृतिक प्रदूषण का स्रोत बन गए हैं व वर्षों से मेरठ में उच्च न्यायालय की खंडपीठ की स्थापना की मांग समेत ऐसी ही अनेक मांगों को भी न्यायसंगत होने के बावजूद गलत ठहराया जा रहा है। देखना यह है कि कहीं हम स्वतंत्रता की आगोश में अपने कर्तव्यों दायित्वों से विमुख तो नहीं होते जा रहे हैं। हमें समझना होगा कि शासकीय प्रशासकीय मामलों में हस्तक्षेप की हमारी उच्चाकांक्षा स्वतंत्रता ही का दुरुपयोग है? हमें प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर कुछ न कुछ दृढसंकल्प लेना चाहिए और आगामी स्वतंत्रता दिवस पर अपने संकल्प की दृढ़ता का आकलन भी अवश्य ही करना चाहिए।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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