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सुदामा चरित

'मांग' सर्ग की स्पष्टता (मूल रूप से उर्दू भाषा में रचित गौर सहाय साहब मुंतजिर की पुस्तक 'सुदामा चरित' को नवल किशोर प्रेस द्वारा मुद्रित किया गया। इस पुस्तक में रचनाकार ने 'माँग' को स्पष्ट अभिव्यक्ति देने के लिए श्रीकृष्ण के बालसखा सुदामा व उनकी धर्मपत्नी सुशीला के मध्य वार्तालाप के माध्यम से वातावरण बनाने का प्रयास किया है। इस वार्तालाप को जो भी पढ़ेगा और समझेगा वह वास्तविकता से रूबरू होकर भावाकुल हो उठेगा। इस वार्तालाप की विशेषता यह है कि सुदामा निर्धनता में भी मूल्यों से समझौता करने के तैयार नहीं हैं।) वार्तालाप सुशीला (मूल रूप में) : मैं सुनती हूँ कि - कृष्ण कन्हैया हैं दानी, कोई दाता नहीं उनका सानी। वह   महाराज   हैं  महालक्ष्मी   हैं    उनकी   रानी।।  उनसे  और  आपसे  है  राब्ता-ए-रूहानी। ऐसे गमख्वार तुम्हारे व तुम ऐसे कंगाल।। क्यों न हैरत हो भला औरों को, और! मुझको मलाल।  वेद कहते हैं कि निर्धन के हैं धन गिरधारी।। सच्चिदानन्द शगुन ब्रह्म । हैं मंगलकारी। चश्मा-ए-फैज़ दो आलम में है उनका जारी।। सब्ज रहती है सखावत की सदा फुलवारी। कोई इस बाग से महरूम नहीं आता है।। फूल लेने कोई जाता है तो फल पाता है।  कृष्ण भगवान मुजस्सिम हैं सरापा-ए-नूर ।। नाम जदोनन्दन व जदुनाथ है उनका मशहूर। सिफ्त-ए-फैज़ अयां है कि बिल अल्ताफ बहूर।। दूर व नज़दीक खबर लेते हैं भक्तों की जरूर।  आप ये हाल-ए-जबां से उनको जब दिखाएंगे।। जल्द अय्याम (दिन) मुसीबत के पलट जायेंगे।।। सुदामा (जवाब) - बल से भगवान तलबगार जमीं के होकर।  खुद बाखुद ओछे हुए पाए वहदत खोकर।।  दर बदर खाते हैं दिन-रात गदागर ढोकर।  बूझ तो किसने कहाँ पाई है रोकड़ खोकर।।  कदर रहती नहीं इन्सान की तलबगारी में।  डालती है तू मुझे किसलिए इस खारी में।। माँगना खूब नहीं जान मेरी कहना मान।  क्यों! बनी जाती हो नादान मेरा कहना मान।।  इससे घट जाती है सब शान मेरा कहना मान।  इससे राजी नहीं भगवान मेरा कहना मान।।  माँग सर पर है तेरे माँग तू क्या देती है?  माँग छूटे हुए बालों को बंधा देती है।। माँगने से कोई बदतर नहीं दुनिया में तरीक। माँगने वाले हैं सब जुए सलामत के तरीक।।  आशना उनका नहीं कोई न मुशझक न शफीक।  देने वाले की जहाँ में है बहुत कम तौफीक।।  किस से क्या माँगिये? मोहताज हैं सब कौड़ी के।  हम भी इन फेलों से हो जायेंगे अब छोड़ी के।।  सख्त हैरत है कि है कौन जहाँ में ऐसा?  मिल गया उसको वही जिसने कि चाहा जैसा।।  एहले दौलत का कयानत में भरोसा कैसा?  कोई कौड़ी की जगह पर नहीं देता पैसा।।  अब्र को देखकर जब सीप ने मुँह फैलाया।  एक कतरे के सिवा कुछ न दहन में आया।। सुशीला (पुनः सुदामा से)  ऐसा बादीन वो यकीं सकून सुदामा के सकून। बोली औरत कि तुम्हारा तो निराला है प्रण।। वह श्रीकृष्ण महाराज हैं दुःख-ओ- दर्द हरण। मुन, मनुज, देव निज करते हैं जिनका भजन।।  उनसे दु:ख अपना कहो जाके तो कुछ दोष नहीं।  उन सा कोई भी अताकोश व खतापोश नहीं।। मैंने देखे हैं बहुत लोग कयानत (सब्र) वाले।  नेक निष्ठा में लगे प्रेम में पगे मतवाले।।  आप जैसे हैं वली वैसे न देखे-भाले।  हाथ माथे पर धरे बैठे हैं छप्पर वाले।।  तिश्नगी (प्यास) कतरा-ए-शबनम से किसकी जाये।  तो कोई किसलिए तालाब व कुआँ खुदवाये।। माँगना उनसे नहीं खूब जो हो आप से कम।  माँगना उनसे नहीं खूब जो करते हों सितम।। माँगना उनसे नहीं खूब जो रखते हों अलम। माँगना उनसे नहीं खूब जो हों नीच व अधम।। माँगना खूब नहीं विप्र पराधीनों से।  माँगना खूब नहीं मुमस्सिक व बेदीनों से।। माँगिये उनसे जो हाज़त को रवा करते हैं।   माँगिये उनसे जो खलकत का भला करते हैं।।  आपकी माँग की तौहीन किया करते हैं।  माँग वह शय है जो मोती से भरी जाती है।।  अपने दूल्हे की दुल्हन माँग से कहलाती है।।। स्रोत - पंडित मधुसूदन शर्मा

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