हिन्दी की एक सुप्रसिद्ध पत्रिका है 'आउटलुक'। इसमें अरसा पूर्व 'जन्म देने वाले के बारे में जानने का है हक' शीर्षक से एक आई.पी.एस. अधिकारी के द्वारा सृजित आलेख जब पढ़ा गया तो उसको पढ़कर सबको बहुत कष्ट हुआ। कष्ट इसलिए हुआ क्योंकि इस आलेख का स्रोत वह अवैध सम्बन्ध था जो कभी बेहद चर्चित रहा था और वह कोई आकस्मिक घटना न होकर एक बेहद शर्मनाक तरीके से लम्बे समय तक चला अवैध सम्बन्ध था।
यह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी से संबंधित हाई प्रोफाइल मामला था। श्री तिवारी उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे जो समाज में आदर्श माना जाता है। इस संबंध का एक अन्य दुखद पहलू यह है कि यह जो कुछ भी हुआ उस समय अवैध सम्बन्धों से सम्बद्ध दोनों पक्ष सुखद दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रहे थे (जैसा कि सभी को ज्ञात है) व महिला ने अपने पति के जीवित होने के बावजूद श्री नारायण दत्त तिवारी जी से शारीरिक सम्बन्ध बनाए। ऐसे में पति जिस मानसिक यातना से गुजरा होगा उसकी मनोदशा से सहज ही रूबरू हुआ जा सकता है। किसी भी आलेख का विषय यदि उपयुक्त हो तो शब्दालंकार उसको सुशोभित कर सकते हैं, परन्तु यदि उसका विषय ही दूषित हो तब शब्दालंकार भी व्यर्थ हो जाते हैं। यह सब क्षम्य था यदि एक मानवीय मूल होता पर यह कष्टदायी तब हो गया जब शीर्ष स्तर से इसको केन्द्र बिन्दु मानकर उस पर आलेख सृजित कर दिये गए और वे भी चिंतक श्रेणी के प्रतिनिधियों के द्वारा। ऐसे में यह सोचने को आमजन विवश हो गया कि क्या उचित-अनुचित में कोई भेद ही नहीं रह गया है।
यहाँ एक यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो जाता है कि क्या उचित-अनुचित की परिभाषा को अलग-अलग तरीके से अलग-अलग वर्गों के लिये व्याख्यायित किया जा सकता है। ऐसा सम्भव नहीं इस से सारी सामाजिक व्यवस्था ही ध्वस्त हो जाएगी। लेखन एक पवित्र कार्य है कम से कम इसको तो भेदभाव जैसी मानसिकता से अलग ही रखा जाना चाहिए।
ट्रेंडसेटर फीचर्स
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें