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व्यक्तित्व का सरल से विशिष्ट में बदलना

     कैलाशो, जो कल तक एक व्यक्तित्व थी, जनवरी 2017 तक एक प्रेरणा बन विशिष्ट कोटि की बन चुकी थी। उस समय जब जनवरी 2017 में उन्होंने अपना शरीर त्यागा। उनकी उम्र यद्यपि बहुत से  ज्यादा नहीं थी, परन्तु उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ सुना, बुना और सीखा था जिसने उनकी नई पीढ़ी को सीखने में बेहद मदद की।
     मानव जीवन से आशय केवल नैत्यिक क्रियायें कर देने भर से नहीं है। जीवन के इस सत्य को कैलाशो देवी ने तब माना था जब वे अल्पायु में ही विधवा हो गई थीं। जीवन कितना कठोर है इसकी अनुभूति भी उनको तब ही हुई। मुजफ्फरनगर के छोटे से गाँव अन्ती में जन्मी कैलाशो देवी को उनके घर से जो मूल्य व है संस्कार मिले। उन्होंने उनको अपने जीवन की कलाकृति को आकार प्रदान करने में मदद की। सामाजिक छल-कपट के माहौल से दूर  साधारण शारीरिक सौष्ठव वाली कैलाशो देवी कब दृढ़प्रतिज्ञ हो गईं इसका आभास स्वयं उनको भी नहीं हो सका। एक सामान्य महिला की भाँति उन्होंने भी अपना ग्रहस्थ जीवन अपने अभिभावकों के  निर्देशन में आरंभ किया। यह उन्होंने वैवाहिक गठबन्धन होते ही तय कर लिया था कि मायके एवं ससुराल दोनों पक्षों को कभी भी शिकायत का मौका नहीं देना है।
     जीवन यात्रा में कौन-कब साथ छोड़ गया इसका कभी मलाल उनको नहीं रहा, परन्तु जब प्राकृतिक कारणों से उनके पति ने उनको मझधार में छोड़ा तो उनकी अगली पांत के सदस्य अर्थात बच्चे बहुत छोटे थे और दुश्वारियाँ अनेक तथा विविध किस्म की थीं। कैलाशो देवी को अपने व्यक्तित्व में इस आकस्मिक आपदा के कारण आए परिवर्तनों का आभास तक नहीं था। यह सब ईश्वरीय देन थी कि कैलाशो देवी अपने दृढसंकल्पों के चलते अपने बच्चों पर एक आवरण की तरह छा गईं। उनके दृढसंकल्पों ने जहाँ उनको आत्मबल प्रदान किया वहीं उनके बच्चों को साहस भी दिया। पति के अभाव की उन्होंने यथासंभव पूर्ति की। साथ ही रिश्तों सम्बन्धों के नियमन में भी प्रमुख भूमिका अदा की। पति के अवसान के उपरान्त की क्रोध में आ जाने वाली कैलाशो देवी अपने जीवन की संध्या में बेहद मृदुल और सौम्य हो चुकी थीं।
     कैलाशो देवी को अपने अन्त समय का आभास कुछ दिनों पूर्व ही हो गया था, परन्तु उन्होंने तनिक से भी विचलित या मानसिक अस्थिरता का प्रदर्शन न करते हुए बच्चों का उपयुक्ततम रूप में मार्गदर्शन किया। इस आलेख के माध्यम से उनका स्मरण उनको श्रद्धासुमन अर्पित करने तथा भावी पीढ़ियों को परिस्थितियों से जूझने की क्षमता विकसित करने के ध्येय से किया जा रहा है। इकहरे बदन की सामान्य प्राकृतिक आकर्षण वाली महिला को पुष्पांजलि है ये जिसने सारा जीवन संस्कारों एवं मूल्यों की पूँजी को सहेजने में लगा दिया इस पुरुष प्रधान समाज में।
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