मासिक उलझन सुलझन के सौजन्य से आपके सम्मुख प्रस्तुत है समाजशास्त्री डा. राकेश राणा जी की आई.आई.एम. के सेवानिवृत्त शिक्षाविद् प्रो. (डा०) जगदीप छोकर जी से बातचीत। श्री छोकर एक लब्धप्रतिष्ठ कानूनविद और सोशल एक्टिविस्ट भी हैं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण छोकर भी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शख्सियत हैं। इस दंपति ने अपनी पी. एच-डी. अमेरिका से कर करियर अपने देश ही में बनाया। श्री छोकर आई.आई.एम. अहमदाबाद में डीन भी रहे। श्री छोकर की लेखन क्षमता भी अद्वितीय है और उनके लेख देश के लगभग समस्त समाचार-पत्रों ही में समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। फिलवक्त वे एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) नामक संगठन से जुड़े हुए हैं, जो अपने क्षेत्र में विविध प्रकृति के शोधों में संलग्न एक संगठन है।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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