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सामाजिक समरसता का उदाहरण

भारत की एक लोकप्रिय हिंदी फिल्म नया दौर का एक प्रसिद्ध गीत है - "यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का। इस देश का यारों क्या कहना, यह देश है दुनिया का गहना।।" इसके गीतकार ने जब भारतीय परिवेश का आकलनकर जब ये पंक्तियां लिखी होंगी तब उनके द्वारा स्थानीय नागरिकों की मन:स्थिति का कितना गहन अध्ययन किया गया होगा? यह कल्पना सहज ही की जा सकती है। इस गीतकार के द्वारा 'अलबेलों' और 'मस्तानों' शब्दों के चयन को राजस्थान में जालोर के विद्यार्थियों, शिक्षकों, ग्रामीणों तथा समरसता के पैरोकारों ने सिद्ध करके दिखा दिया है और रही-सही कसर पूरी कर दी है एक स्थानीय शिक्षक संदीप जोशी जी ने पूरे वृत्तांत को विस्तार देकर! ईश्वर से प्रार्थना कि भारतीयों में ऐसी भावना सदैव बनी रहे। आगे संदीप जी प्रदत्त समरसता की सीख संदर्भित वृत्तांत है - विद्यालय सामाजिक चेतना का केंद्र है, यह अक्सर कहा जाता है। जोधपुर के निकट तिंवरी स्थित एक निजी विद्यालय के बच्चों ने मिलकर विद्यालय के पास में रहने वाली भील परिवार की एक अनाथ बहन की शादी में 251,000 का मायरा भरकर विद्यालय के सामाजिक सरोकार की बात की पुष्टि के साथ ही सामाजिक समरसता का भी एक सार्थक उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किया है। तिंवरी निवासी एक बहन के माता-पिता का पांच वर्ष पहले बीमारी के कारण का निधन हो गया था। 85 वर्ष की बूढ़ी दादी विवाह की चिंता में परेशान थी। निकट स्थित शहीदे आजम भगतसिंह विद्यालय के गुरुजी को इसकी जानकारी मिली। गुरुजी ने स्टाफ और विद्यार्थियों के साथ चर्चा करके मायरा भरने का बीड़ा उठा लिया। मायरा राजस्थान में विवाह समारोह से जुड़ी एक परंपरा है जिसका विवाह हो रहा है। उसके माता के घर से (पीहर पक्ष से) अर्थात दूल्हा दुल्हन के ननिहाल से विशेष भेंट लाई जाती है। यह भेंट कपड़ों के रूप में, मिठाई, आभूषण, नकदी इत्यादि के रूप में होती है। विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा इस बहन के विवाह में मायरा भरने के समाचार मिलने पर ग्रामीण भी इसमें साथ जुटे और हो गया अद्भुत अनोखा विवाह समारोह। जाने-अनजाने बच्चों ने पूरे गांव को सामाजिक समरसता का अद्भुत पाठ सिखा दिया। यह विवाह संस्कार बच्चों के लिए, दुल्हन के लिए, बूढ़ी दादी के लिए एवं सब गांववासियों के लिए भी यादगार बन गया। विवाह संस्कार बच्चों के साथ साथ बड़ों को भी संस्कार देने वाला अवसर सिद्ध हुआ। ऐसे सार्थक उदाहरणों की एक लंबी ऐतिहासिक परंपरा और श्रंखला के कारण ही हमारे यहां 'गांव की बेटी' 'मौहल्ले की बेटी' जैसे विशेषण का विकास हुआ है। तिंवरी के विद्यार्थियों ने इसे सार्थक सिद्ध करके दिखाया है। गांव की बेटी वाले भाव का पुनर्जागरण और पुनर्स्थापना ही नारी सुरक्षा की गारंटी है। यह भाव पुनः ठीक से स्थापित हो गया तो छेड़छाड़ दुष्कर्म जैसे अपराधों का भी समाधान हो जाएगा। गांव की बेटी की सुरक्षा और सम्मान के लिए पूरा गांव मोहल्ला यदि एकजुट है तो किसी भी अपराधी की, किसी महिला की तरफ आंख उठाकर भी देखने की हिम्मत नहीं होगी। एक सबके लिए, सब एक के लिए का सहकारिता भाव, समरसता भाव हमारे जीवन मूल्य, हमारी विरासत है और हमारी पूंजी हैं। इन्हें फिर से सहेजने संवारने और पल्लवित करने की आवश्यकता है। ऐसे उदाहरण आशा की किरण जगाते हैं। ऐसे आयोजन सामाजिक समरसता, परिवार भाव, अपनत्व, टीमवर्क जैसे अनेक संस्कारों का जीवंत दर्शन है। चर्चा-परिचर्चा, चिंतन-मनन, भाषण- संभाषण से आगे बढ़कर यह दौर अच्छे उदाहरण खड़े करने का समय है। समाज की पांच सामूहिक चेतना और समाज का सामूहिक दायित्व भाव विश्वगुरु भारत के आधार स्तंभ रहे हैं और भविष्य में भी भारत की उन्नति का आधार यही बनने वाले हैं। ऐसे छोटे-छोटे अनेक उदाहरण समाज के सामने एक प्रकाश स्तंभ की तरह होते हैं। संपूर्ण समाज इन से प्रेरणा प्राप्त करता है। विद्यालय द्वारा दिए गए संस्कार भावी जीवन में भी पुष्पित पल्लवित सुरभित होते है, ऐसी मंगल कामनाएं। विद्यालय के गुरुजी आईदान सिंह जी शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास जोधपुर प्रांत के एक आयाम के प्रांत संयोजक है। इस विद्यालय के विद्यार्थी और विद्यालय परिवार सामाजिक सरोकारों के कार्य में सदैव अग्रणी रहता । पिछले 9 वर्षों में लगभग तीस लाख रुपये सामाजिक सरोकार के कार्य, गौ सेवा, शहीद परिवारों का सम्मान इत्यादि में लगाने की जानकारी मिली है। संदीप जोशी (सदस्य एनसीटीई) @ टाइम्स ऑफ ब्लू सिटी जालोर (राज.)

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