विविध विषयों पर लिखना मेरी सर्वप्रिय रुचि यदि है तो उसके पीछे कुछ कारण हैं। मैंने देखा, समझा और पाया है कि समाज में अधिसंख्य लोग बुद्धिमता की दृष्टि से यदि आकलन करें तो सिर्फ बुद्धिमानों की कार्यशाला के रूप में इस सृष्टि में हैं। कुछ स्थितियां सिर्फ और सिर्फ प्रश्नचिन्ह ही लगाती हैं स्पष्ट कुछ भी नहीं कर पातीं।
अभी के एक हालिया वाकये ने मुझको अंदर तक हिलाकर झकझोर कर रख दिया। जब मैंने जाना और समझा कि हम कैसे कुरीतियों को समाप्त करने का प्रण लेकर उनको अपनाते चले जाते हैं।
और! मुझको सोचने के लिए विवश कर दिया कि
आखिर हम किधर जा रहे हैं?
क्यों जा रहे हैं?
हमारा मंतव्य क्या है?
हमको उस से हासिल क्या होने जा रहा है?
आइए, अब जरा मुद्दे पर आते हैं।
हाल ही में मुझको एक जन्मदिवस पार्टी में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसके केंद्र में एक चार वर्षीय बालक था, तो यह स्पष्ट था कि उसको शुभाशीष दिए जाने हैं, लेकिन मुझको वहां पर मद्यपान की व्यवस्था को देखकर कुछ भी समझ नहीं आया और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं तो सोचता ही रह गया कि
'क्या मद्यपान के उपरांत वहां पर उपस्थित लोग उस बालक को शुभाशीष देने की स्थिति में रह भी पाएंगे?'
'क्या बालक को आशीषों की व्यवस्था करने का हमारा प्रयास सार्थक होने जा रहा?'
पार्टी में परिपक्व लोगों का जमावड़ा था, लेकिन मद्यपान में व्यस्त होने के कारण परिपक्वता मखौल बनकर रह गई थी।उपस्थित युवाओं और बालकों ने उस सबसे क्या सीखा होगा मुझको कुछ भी समझ नहीं आया। कुरीतियों को दूर करने की अलख जगाने वालों में शुमार पांच से अधिक लोग उस पार्टी में सम्मिलित थे और मेरे जैसे मद्यपान न करने वाले वहां पर गिने चुने ही लोग थे। सो मैं अपनी बात बताऊं कि माहौल को अनुकूल न देखकर मैं विचारमग्न हो गया। सोचा सोचा खूब सोचा। और! आखिरकार मैं तो नैराश्य भाव से यही सब लिखने बैठ गया।
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