प्रस्तुत समाचार अमर उजाला समाचार पत्र में 25 जून 2023 को प्रकाशित हुआ और हर स्तर पर अत्यंत विमर्श की दरकार रखता है।
लखनऊ। केंद्र सरकार की ओर से दिन और रात के लिए अलग- अलग बिजली दर लागू करने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। उपभोक्ता परिषद ने इस मामले में मोर्चा खोल दिया है। देश भर के अन्य उपभोक्ता संगठनों को एकजुट कर नियामक आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक याचिका लगाने की तैयारी चल रही है।
केंद्र सरकार ने विद्युत उपभोक्ता अधिकार नियम 2020 में संशोधन के माध्यम से बिजली टैरिफ प्रणाली में दो बदलाव पेश किए हैं, जिसमें दिन और रात की बिजली दर में अंतर रहेगा।
यह कानून एक अप्रैल 2025 से लागू करने की तैयारी है। इससे दिन में 10 से 20 प्रतिशत सस्ती और रात में 10 से 20 प्रतिशत महंगी बिजली दी जाएगी।
जबकि उत्तर प्रदेश में विद्युत नियामक आयोग ने छोटी और मध्यम पावर पब्लिक लैंप और भारी उद्योग के लिए अलग टैरिफ लागू कर रखा है।
यही वजह है कि इस कानून की जानकारी मिलते ही विरोध शुरू हो गया है।
राज्य उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा के कहना है कि घरेलू विद्युत उपभोक्ता अपने कुल उपभोग का 30 प्रतिशत दिन में 70 प्रतिशत रात में उपभोग करते हैं। इस कानून के जरिए दो रुपया का फायदा दिखाकर पांच रुपये वसूलने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को लेकर भारत सरकार के केंद्रीय ऊर्जा सचिव आलोक कुमार से बात की गई है।
उनका तर्क था कि यह नेशनल पॉलिसी है। ऐसे में ऊर्जा सचिव को बता दिया गया है कि उपभोक्ताओं का अहित करने वाली किसी भी पॉलिसी को लागू नहीं होने दिया जाएगा। इसका हर स्तर पर विरोध होगा। इसलिए इस पर सरकार पुनर्विचार करें। यह भी बताया गया कि इससे घरेलू उपभोक्ता तबाह हो जाएगा। (अमर उजाला ब्यूरो)
उपभोक्ताओं सरोकारों को लेकर आज कोई भी नहीं सोच रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद से उपभोक्ता को किसी उत्पाद को क्रय करने का प्रमाण बिल रूप में प्राप्त करने के लिए जीएसटी भुगतान के लिए विवश किया जाता है। अतः उपभोक्ता बिना बिल के उत्पाद लेने का निर्णय ले लेता है।
अब आते हैं बिजली के मुद्दे पर तो हमको लगता है कि बिल में की गई व्यवस्था से शासन जितना राजस्व एकत्र कर पाएगा उस से भी अधिक तो विद्युत अपव्यय और अनावश्यक कसरतें न करके सहज भाव से बचाया जा सकना संभव है।
जरूरत सब ही के लिए विमर्श की है कि असहज करने वाले प्रावधानों को लागू करने से बचा जाए और राष्ट्र हित में अपव्यय से भी बचा जाए।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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