सुलझन
उलझन है कि "विविध प्रकृति की दुविधाओं के माहौल में हमें संबल किस प्रकार मिल सकता है?"
व्यक्ति प्रायः इस दुविधा में रहता है कि उसका अब तक का ज्ञान, समझ और जीवन मूल्य सही हैं या वर्तमान परिस्थितियाँ सही हैं। उदाहरण के लिए, हमने सीखा है कि सड़क के बायीं ओर गाड़ी चलाना है, दायें से ओवरटेक करना है, किसी को परेशान नहीं करना है और ट्रैफ़िक नियमों का पालन करना है। होना तो यह चाहिए था कि नियमों का पालन करने वाले सुखी होते और उल्लंघन करने वालों को परेशानियों का सामना करना पड़ता। लेकिन व्यवहार में हम देखते हैं कि जीवन के हर क्षेत्र में इसका उल्टा हो रहा है। ऐसे में हम दुविधा में रहते हैं कि अपने जीवन मूल्यों पर चलें या परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें।
दुविधा पर चर्चा करें तो हमारे सामने महाभारत के दो पात्र आते हैं। एक धर्मराज युधिष्ठिर जिनके सामने यह दुविधा रहती है कि वे अश्वत्थामा की मृत्यु के बारे में असत्य बोलें या नहीं। दूसरे भीष्म जिनके सामने द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था और वे दुविधा में थे कि राजधर्म निभाएँ या द्रौपदी को बचाएँ। जो जीवन भर सत्य की राह पर चला हो, उसके लिए झूठ बोलना कठिन था और जिसने जीवन भर राजधर्म निभाया, उसके लिए राज परिवार के विरुद्ध जाना कठिन था।
भीष्म उसी राह पर चले जिस पर वे जीवन भर चले थे और युधिष्ठिर ने अपने संस्कारों से अलग चलना तय किया। नियम तोड़ने वाला हर व्यक्ति युधिष्ठिर नहीं हो सकता। लेकिन कई बार हमारे उद्देश्य इतने महान हो जाते हैं कि वे सही और गलत की परिभाषा बदल देते हैं। ज़रा कुछ बानगी देखें -
मीराबाई लोक-लाज की परवाह किए बगैर कृष्ण भक्ति में लीन हो गईं।
सीता ने लक्ष्मण रेखा की परवाह नहीं की क्योंकि उन्हें चिंता थी कि साधु नाराज़ होकर न चला जाए।
हमारे जीवन में सही क्या है और गलत क्या है, इस संबंध में सबकी अपनी-अपनी दृष्टि है।
फिलहाल हम यह विचार कर रहे हैं कि हम संबल कहाँ से प्राप्त करें; इस दुविधा से बाहर कैसे निकलें कि हम जो कर रहे हैं, वह सही है।
हमारा पहला संबल हमारे उद्देश्य होते हैं। हम किन परंपराओं के वाहक हैं और हम दुनिया में किस तरह की पहचान बनाना चाहते हैं, उसके अनुसार हम निर्णय लेते हैं। यदि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़े, हानि हो, फिर भी हमें यह संबल रहेगा कि हम सही राह पर चल रहे हैं। लेकिन अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अगर हम दूसरों को परेशानी में डालते हैं। तो इसका अपराध बोध हमें कभी न कभी ज़रूर परेशान करेगा।
उद्देश्य प्राप्त कर लेने के बाद भी मन में संतोष कभी प्राप्त नहीं होगा। हम अपने कर्मों के चयन के लिए जितने स्वतंत्र हैं, उनके फल भुगतने के लिए उतने ही बाध्य हैं।
हमारा दूसरा संबल हमारा परिवार और शुभाकांक्षी (मित्र आदि) हैं।
उनके परिप्रेक्ष्य में बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए कि
हम उन्हें धोखे में न रखें। अपने उद्देश्यों, अपने काम-काज, अपनी गतिविधियों के बारे में उन्हें बताते रहना चाहिए और ऐसा कोई भी काम करने से बचना चाहिए जिससे उनके सामने शर्मसार होना पड़े।
लोगों से कटकर जीने वाले लोग अपार सफलता पाने के बावजूद अंत में अकेले रह जाते हैं। जिस संबल की हम बात कर रहे हैं, बस वही नहीं रहता। व्यक्ति अपने परिवार और शुभेच्छुओं को ध्यान में रखे तो बहुत सारी दुविधाओं को पार कर सकता है।
हमारा एक बड़ा संबल हमारे अनुभव हैं। व्यक्ति तीन प्रकार से सीखता है- चिंतन-मनन करके, दूसरों को देखकर और अपनी गलतियों से।
ये अर्जित अनुभव हमें निर्णय-सक्षम बनाते हैं। व्यक्ति को अनुभव प्राप्त करने से हिचकना नहीं चाहिए। ऐसी जोखिम नहीं उठानी चाहिए कि जीवन ही खतरे में पड़ जाए या व्यक्ति दिवालिया हो जाए, लेकिन छोटी-मोटी जोखिम लेकर अगर कुछ जानने-समझने को मिल रहा है तो कदम पीछे नहीं लेने चाहिए। अनुभवी लोगों से सलाह लेकर भी हम कई दुविधाएँ पार कर जाते हैं। कहा जाता है कि ज्ञान का विकल्प हो सकता है लेकिन अनुभव का विकल्प नहीं हो सकता।
ज्ञान और कौशल भी हमारे बहुत बड़े संबल हैं। पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान, बड़े-बुजुर्गों से प्राप्त ज्ञान, कोई सीखी हुई विद्या (कौशल) हमारे जीवन को सुगम बनाते हैं।
पुस्तक मनुष्यों का बहुत बड़ा आविष्कार है। हजार वर्ष पहले संचित ज्ञान से हम आज भी लाभान्वित हो सकते हैं। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, पंचतंत्र आदि हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। इसी प्रकार, हम जो कौशल प्राप्त करते हैं- वाहन चलाना, तैरना, भोजन बनाना, भाषण देना, नई भाषाएँ सीखना, कंप्यूटर का उपयोग आदि, ये सभी हमें सशक्त बनाते हैं। हम जितना सीखने में व्यस्त रहते हैं, उतना बुराइयों से दूर रहते हैं। अपने कौशल से हम स्वावलंबी बन सकते हैं और अपनी शर्तों पर जीवन जी सकते हैं। हम चाहें तो अपने कौशल से दूसरों की मदद भी कर सकते हैं।
हमारे शौक भी हमारे संबल होते हैं। शौक तनाव से उबरने में मदद करते हैं। व्यक्ति यदि तनावग्रस्त हो तो उसके गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। अपना थोड़ा समय शौकिया गतिविधि में बिताने से व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
हमारा स्वस्थ शरीर हमारा बहुत बड़ा संबल है। बीमार व्यक्ति कई प्रकार से पराधीन होता है।
जितना हो सके, स्वयं को बीमारियों से दूर रखने पर ध्यान दें। ‘स्वस्थ शरीर से स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है’ यह कहावत आज भी प्रासंगिक है।
हमारा अंतिम और सबसे बड़ा संबल हमारी आध्यात्मिकता है।
चाहे जो हो, हम एक दिन यह शरीर और यह दुनिया छोड़कर जाएँगे। हमारे जीवन मूल्य, हमारे रिश्ते, हमारी संपत्ति आदि सब कुछ नश्वर है, इसलिए इनकी बहुत अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए। यह बात हमें निर्णय लेने में और परिस्थितियों को स्वीकार करने में बहुत मदद करती है। हम रंगमंच पर आकर अपनी भूमिका निभा रहे हैं, फिर हमें इस रंगमंच से चले जाना है। हम दोस्तों के साथ टेबलटेनिस खेलते हैं तो खूब आनंद लेकर खेलते हैं लेकिन दो घंटे बाद किसी को याद नहीं रहता कि किसने कितने गेम जीते। जीवन का आनंद भी इसी प्रकार लिया जाना चाहिए कि यहाँ हम जो भी स्कोर कर रहे हैं, उसका थोड़ी देर बाद कोई मतलब नहीं रहेगा। एक मध्यकालीन शायर ने लिखा था- _आखिर इसमें पान बंधेगा जिस सफ़े पर छपा है ये।_ यानी, आप चाहे जितना अच्छा लिखकर खुश हो जाओ, आखिरकार वह कागज़ पान बांधने के काम आएगा। अर्थात् सब कुछ नश्वर है तो फिर क्यों चिंता करना।
भगवान बुद्ध की मूर्ति को हम अभय मुद्रा में देखते हैं। मराठी संत स्वामी समर्थ का एक कथन है-
भिउ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे उभा (डरो मत, मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ)। आप खोजेंगे तो जीवन में और भी कई संबल मिल जाएँगे। जैसी हम इच्छाएँ करते हैं, वैसे ही कार्यों की ओर प्रवृत्त होते हैं, वैसे ही लोगों से हम प्रेरित होते हैं और वैसे ही संबल हम खोज लेते हैं।
यशवंत गहलौत
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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