उत्तराखंड के लोकप्रिय कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण द्वारा कुछ मुक्तक आपके समक्ष मासिक उलझन सुलझन की ओर से प्रस्तुत हैं -
मीत
मीत के तो ध्यान से ही
एक नवल संगीत बजता।
जो सजीला स्वप्न देखा
वो ही आ भावों में सजता।
मीत का बस मुस्कराना
ताप सब हरता हृदय का,
किन्तु बिछड़ा मीत जब भी
नाम दिखता मीत भजता।
रिश्ते (मुक्तक)
जो बने रिश्ते जगत में
उनको जीवन भर निभाना।
क्या पता कितना है जीवन?
कोई न इसका ठिकाना।
हर कोई रिश्ता स्नेह की
डोर से ही तो बन्धा है,
डोर में बस गाँठ कोई
ना पड़े ये कर दिखाना।
क्रंदन
हर हृदय क्रंदन भरा है
वन्दना हो ईश कैसे?
लुप्त-सी श्रद्धा दिखी है
फिर झुके ये शीश कैसे?
श्रद्धा भक्ति प्रेम पावन
रोज ही दिखते सिसकते,
फिर बताओ हिय क्रन्दन की
मिटे ये टीस कैसे?
रूठना
जब भी रूठो तुम किसी से
खींच न रेखा दिखाना।
गर खिंची रेखा कोई तो
प्यार से उसको मिटाना।
रूठकर फिर मान जाना
प्यार हृदय का दिखाना,
इक दिखा मुस्कान प्यारी
अपने रूठों को मनाना।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
बहुत बढ़िया 👌
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