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असहज होता आम जनजीवन

     विगत कुछ वर्षों का संज्ञान लें तो आम जनजीवन में असहजता (uneasiness) में असीमित वृद्धि हुई है जिससे तमाम  प्रकार की दिक्कतों से आज आम नागरिक रूबरू है। प्रिन्ट  मीडिया द्वारा नकारात्मकता के उभारने के प्रयासों को समाज में गंभीरता से नहीं लिया गया और यह ही स्थिति कूट रचना का सृजन करने के प्रत्यक्ष दोषी टेलीविजन धारावाहिकों की भी रही। फलतः नकारात्मकता आज सिर चढ़कर बोल रही है।
     समग्र भाव से यदि चिन्तन करें और समझना चाहें कि असहजता क्या है तो जान लें कि यह वह स्थिति है जो किसी भी सामान्य स्थिति से परे कुछ ऐसी घटनाओं की जनक होती है जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होती है और जब ऐसी घटनाएं यथार्थ रूप  लेती हैं तो हम अपनेआप को असहज महसूस करते हैं। हम अपनेआप को उस जैसी घटनाओं से परस्पर सम्बद्ध करके देखने लगते हैं तो इस असहजता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है, जो अन्ततः निरोधक रूप से प्रत्युत्तर में विरोध कर स्थिति पैदा करती है।
      यह नकारात्मकता ही का प्रभाव है कि दबाव समूह प्रत्येक  कार्यवाही को प्रभावित करने लगे हैं। पूर्व में विधायिका के प्रशासनिक  विभाग बेहद दिलेरी के साथ अपने निर्णयों को अंजाम दे दिया करते थे, परन्तु आज दबाव समूहों के साथ-साथ अन्य विविध हस्तक्षेप भी उनमें होने लगे हैं। इससे उत्पन होने लगी है असहजता व अनिश्चितता। समाज में होने वाली विभिन्न गतिविधियों से भी असहजता व असुरक्षा का भाव उत्पन होता है। गतिविधियों के उद्देश्यों में भिन्नता संभव है, परंतु उनका परिणाम अंतिम रूप से असहजता का भाव उत्पन्न कर देता है। मेरठ जनपद से लेकर विश्व स्तर तक पर ऐसी घटनाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। ये या इस जैसी घटनाएं जब नियंत्रण में होती है तो जीवन सहज-सरल लगने लगता है, लेकिन जब अनियन्त्रित होती है तो 'कैसे होगा?' जैसे भाव चेहरे व मन में उत्पन्न करती हैं।
     समाज का जितना विकास हुआ है लगभग समकक्ष ही उसका पतन भी साथ-साथ हो रहा है। बल्कि सही मायनों में देखें तो पतन के ग्राफ की प्रगति विकास की तुलना में कहीं अधिक है जब भी हम विकासशील प्रवृत्तियों को प्रश्रय देते हैं तो बेहतर परिणाम सामने आते हैं, परंतु आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में असामान्य घटनाओं की संख्या में अकूत वृद्धि हुई है और इनमें से अनेक तो झकझोर देने वाली हैं। इस प्रकार की कुछ घटनाओं का उल्लेख किए बिना उनको समझना दुश्वार होगा। ये विगत कुछ वर्षों पूर्व की हैं। मेरठ जनपद  के चार होनहार मेरिटोरियस डॉक्टर युवाओं की एक सड़क दुर्घटना में साकेत क्षेत्र में मृत्यु हो गई। वे सभी अपने-अपने अध्ययन क्षेत्र में प्रवीण थे और परिजनों की आशा थे। उनके द्वारा एक सौ पचास किलोमीटर प्रति घंटा की गति से गाड़ी चलाना इसमें मूल में रहा। विचार बिंदु यह है कि साक्षर समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले इन युवाओं ने विवेक का उपयोग क्यों नहीं किया? इसके अतिरिक्त विभिन्न बहानों से  जीवन छीन लेने संबंधी समाचार भी जानकारी में आते रहते हैं। ये तो सिर्फ बानगियाँ भर हैं और इनके यहाँ उल्लेख के मूल में आगे के लिए सतर्क किया जाना है। असामान्यता और असहजता से दूर रहें और मौलिक-स्वाभाविक जीवन आपके समक्ष होगा। 
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