(यहां पर यानि अंतर्संबंध ब्लॉग पर सहारनपुर से काश्मीर गए खेतिहर जाति गुर्जर के समन्वयमंडल के सात सदस्यों में से दो सदस्यों की अनुभूतियों का विवरण दिया जा रहा है। यह भी जानें कि वैली में गुर्जर नहीं गूजर संबोधन प्रचलित है। अतः वैली के संदर्भ में प्रयुक्त गुर्जर को गूजर समझा जाए।)
अभियंता शेषराज जी पंवार का अनुभवमैं शेषराज सिंह पंवार हूं, जो सेवानिवृत्त (अभियंता 75 वर्ष आयु) होने के उपरांत से निरंतर सामाजिक कार्य कर रहा हूं। राजकीय सेवा में रहते हुए 1990 से ही सामाजिक जागृति का कार्य कर रहा हूं । बामसेफ संगठन में 1994 से 2002 तक राष्ट्रीय महासचिव के रूप में और 2002 से 2009 तक सेवानिवृत्त होने तक राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। 2014 से खेतिहर गुर्जर समाज की जागृति के लिए निरंंतर प्रयास कर रहा हूं। मैंने वर्ष 2016 एवं 2018 में 'गुर्जर इतिहास' पर सम्मेलन सहारनपुर में कराये और 2020 में गुर्जर इतिहास पर 'वृहद कुणबे की सामाजिक यात्रा' (500 पृष्ठ) की एक हजार पुस्तकें प्रकाशित और वितरित की हैं।
कश्मीर की गुर्जर जनजाति के परिवारों से मिलकर आत्मीयता का सुखद अनुभव जीवनपर्यंत स्मरण रहेगा। यात्रा में गुर्जर समाज की समस्याओं को ठीक से समझने का अवसर मिला। समस्त गुर्जर समाज में राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी
हुई है। समाज के एक ऐसे महान व्यक्तित्व से भी मिले जिनकी आंखों में आतंकवादियों ने तेजाब डाल दिया था। विडंबना यह है कि राष्ट्र भक्त बनने वाली सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया। हम अपने स्तर से यथायोग्य करने का प्रयास कर रहे हैं।
कश्मीर में हम बनिहाल, अनंतनाग और श्रीनगर गए; लेकिन हम ने, त्राल, कंगन और पहलगाम के गुर्जर समाज के
लोगों से भेंट की।
संस्कृति शब्द से ही मैं असहमत हूं, लेकिन सभ्यता हमारी और कश्मीर की बहुत हद तक समान है। गोजरी भाषा हम और कश्मीर का गुर्जर समाज प्रयोग करता है। पगडी का रंग कश्मीर में सफेद है राजस्थान में रंगीन है। सत्कार मे मैदानी भाग से कश्मीरी कई गुणा आगे हैं। कश्मीर के गुर्जर के पास कृषि भूमि नहीं है केवल पशुपालन है और अधिकांश घुमंतु है।जम्मू-कश्मीर में बहुत अधिक सामाजिक विभाजन है। गुर्जर और कश्मीरी अलग अलग हैं। अधिकांश कश्मीरी ( धर्म परिवर्तित) गूजरों को हेय दृष्टि से देखते है और गुर्जर के विकास को अवरुद्ध करना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि गुर्जर शिक्षित होकर सम्मानित जीवन व्यतीत करे, लेकिन गुर्जर जुझारू कौम है ( गुर्जर बना ही जूजर से है) और आगे आ रही है बस हमारे प्रेम की अभिलाषा रखती है।
'अनुवांशिक बल, सुनहरा कल' समाज की दूरियों को कम करने के लिए कार्यरत है सबका सहयोग अपेक्षित है।
शिक्षाविद् डा. रीना वर्मा जी का अनुभव
मैं डा० रीना वर्मा एक शिक्षाविद और समाज सेविका हूं। हमारा एक ग्रुप अन्वेषण में लगा है। बहुत दिनों से मन था काश्मीर जाने का और वहाँ का जीवन नजदीक से देखने का। विशेष रूप से वहाँ की घुमन्तू जनजातियों का जीवन। पिछले दिनों ऐसा मौका मिला तब मिला जब हमारे एक ग्रुप 'अनुवांशिक बल, सुनहरा कल' के साथ जाने का hu।ko मौका मिला। जिसमें हम अन्वेषण के लिए भारत के अलग अलग राज्यों के नगरों में जाते हैं और वहाँ जाति विशेष 'गुर्जर समुदाय के साथ इंटरेक्ट करते हैं और जागरूकता अभियान और कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इस बार का हमारा दो दिवसीय सम्मेलन पहलगाम के टाउनहॉल में था।
हमारी काश्मीर यात्रा मेरे जीवन के अच्छे अनुभवों में से एक रही। वहाँ की जनजातियों से मिलने का अनुभव मिला-जुला था। जहाँ उन लोगों के सरल स्वभाव ने मन को मोहा, वहीं उनकी समस्यायें देखकर मन 'आहत भी हुआ।
हमने एक पूरा दिन गुर्जर और गुर्जर बकरवाल बस्तियों में बिताया। दोनों ही काश्मीर में अनुसूचित जनजातियों में आते हैं। गुर्जर फिर भी आगे रहे हैं। हमारे साथ थे अल्ताफ जो गुर्जर समुदाय से पी.एच-डी. या यूनिवर्सिटी तक पहुँचने वाली पहली पीढ़ी से हैं। गुर्जर हर क्षेत्र मे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। शिक्षा हो या व्यवसाय आदि, खेती में अखरोट, सेब और मक्का पैदा होती है। तो शासन द्वारा बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। सेब, अखरोट बाजारों में तो बहुत महंगा मिलता है, लेकिन किसान की लागत भी मुश्किल से निकल पाती है। गुर्जर बकरवाल वर्ग की स्थिति काफी खराब है। उनकी बस्तियों के न पानी है और ना ही बिजली। बच्चों के लिये अच्छे स्कूल नही हैं युवा बेरोजगार हैं। मवेशियों के लालन पालन और व्यवसाय के लिये अच्छी फलदाई योजनायें नहीं हैं।
हमने दो दिन कार्यशालायें कीं, जिनमें हर विषय पर लेक्चर्स और चर्चा हुईं। यह उत्साहित कर रहा कि बड़ी संख्या मे स्थानीय लोगों ने उनमें हिस्सा लिया। उनका अनुभव अच्छा रहा। उनका कहना था कि बातें सुनकर उनका अच्छा मार्गदर्शन हुआ और भविष्य में वे ऐसे और कार्यक्रमों के साथ जुड़ना चाहेंगे।
काश्मीर में हम पहलगाम, सोनमर्ग, गुलमर्ग और श्रीनगर गये।
स्थानीय और काश्मीरी संस्कृति में सबसे बडा अंतर तो यह था कि वहाँ महानगरों में आपसी प्यार व अतिथि सत्कार कम होता जा रहा है और यहाँ लोग अजीब से तनाव में हैं।
काश्मीरी लोगों खासकर कि यह जनजाति बहुत मेहमाननवाज, खुशमिजाज़ और मिलनसार लगी। लोगों के पास संसाधन और पैसा भले ही नहीं है, पर इज्जत बहुत देते हैं। समय बहुत देते हैं। वहाँ आयोजन के दौरान पूरे छह दिन यहां लोग हम लोगों के साथ रहे। और! उनकी मेहमाननवाजी, दस्तरखान ये सब तो दिल को छू गया।
अपनी इस काश्मीर यात्रा से मैंने सीखा कि मगर धन को दो लोगों के बीच से निकाल दिया जाये तो इंसानियत का जो रिश्ता बनता है वह अनमोल है।
'अनुवांशिक बल, सुनहरा कल' अन्वेषण समूह की खोज
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