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जानें कौन बन सकते प्रेरक!

भूमिका
सम्पूर्ण सृष्टि में व्यवस्थाओं के अंतर्गत मिलने वाली राहतों का लाभ सदैव जागरूक वर्ग ही उठा पाता है। यह समाज में जाति, धर्म, रंग या किसी अन्य भेद से परे वह जिज्ञासु वर्ग है जो समाज के किसी भी क्षेत्र में हो रहे किसी भी किस्म के परिवर्तनों को जानने का आकांक्षी होता है। यहां पर एक ऐसी ही शक्सियत का विवरण दिया जा रहा है जिन्होंने प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्र में शासन स्तर से दी जाने वाली राहत प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की तो अपनी जागरूकता ही से।
विवरण
विश्व भर में जहाँ-जहाँ भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहाँ-वहाँ ही जागरूक वर्ग या व्यक्ति व्यवस्था का सर्वाधिक लाभ उठाते हैं। इसके अतिरिक्त जागरूक वर्ग ही  सरकारी मशीनरी को क्रियाशील भी रखता है। और! संबंधित चैनलों में से किसी को भी अपने कर्त्तव्यों से विमुख नहीं होने देता।
वर्ष 2015 में अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि ने सरसों एवं गेहूँ की पैदावार पर जब विपरीत प्रभाव डाला तो केन्द्रीय शासन तथा उत्तर प्रदेश शासन में कृषकों को राहत देने के लिए सुगबुगाहट शुरू हुई। तत्काल ही सुगबुगाहट शुरू हुई आकस्मिक आपदा के रूप में आई इस आपदा से प्रभावित कृषकों में भी। मेरठ जनपद के परीक्षितगढ़ ब्लॉक के ग्राम अहमदपुरी निवासी महाराज सिंह भी बेमौसम बरसात से प्रभावित हुए थे, तो प्राकृतिक आपदा से राहत की बात सुनकर वे भी सक्रिय हुए। इससे पहले कि उनके प्रयासों का उल्लेख किया जाए आइए  पहले उनके साक्षर परिवार से रूबरू हो लेते हैं। 
महाराज सिंह का जन्म एक किसान दम्पति श्री हरदत्त सिंह एवं श्रीमती मुख्त्यारी देवी के यहाँ 10 जनवरी 1930 को हुआ।
उन्हें किसान  परिवार से होने के बावजूद सटीक मार्गदर्शन व शिक्षा की महत्ता का ज्ञान हुआ तो वे यथोचित शिक्षा ग्रहण कर राजस्थान शासन में सार्वजनिक लोक विभाग (पी.डब्ल्यू.डी.) में सेवारत् हो गए वर्ष 1960 में। श्री महाराज सिंह वर्ष 1996 में सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा कर सवाई माधोपुर से सेवानिवृत्त हुए। महाराज सिंह का विवाह श्रीमती वीरवती से हुआ और इस दम्पत्ति को तीन पुत्रों व एक पुत्री की प्राप्ति हुई। महाराज सिंह दम्पत्ति ने शिक्षा की महत्ता को समझा और बच्चों को उच्च शिक्षित किया। उनके चारों बच्चों में दो पुत्र इंजीनियर जबकि एक अधिवक्ता बन गया। उनके तीन लड़कों में से एक का असामाजिक निधन हो गया। उनकी पुत्री ने विज्ञान विषय में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की है और उनके दामाद आई.आर.एस. हैं। उनके पौत्र-पौत्रियाँ भी शिक्षा के प्रति समर्पित हैं, जबकि महाराज सिंह एक जागरूक व जिम्मेदार नागरिक हैं। महाराज सिंह का निवास मेरठ में है, परंतु वे गाँव के भी निरंतर सम्पर्क में रहते हैं। यही कारण है कि वर्षा एवं ओलावृषिअट से उनकी गेहूँ की फसल प्रभावित होने की जानकारी मिलने पर उन्होंने तत्काल जिला मुख्यालय तथा संबंधित तहसील मवाना से जानकारी लेकर एक विस्तृत विवरण युक्त प्रार्थना-पत्र संबंधित अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया और समय-समय पर उस आवेदन-पत्र की स्थिति से अवगत भी होते रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक बाग भी लगा रखा है। इस बाग में भी बेमौसम वर्षा से काफी हानि हुई थी, सो उन्होंने बाग की बाबत भी एक प्रार्थना-पत्र मेरठ में जिला उद्यान अधिकारी को सौंपा। इस बीच वे इन दोनों प्रार्थना-पत्रों की स्थिति से अवगत होते रहे। प्रार्थना-पत्रों के निरन्तर सम्पर्क में रहने का लाभ उन्हें यह मिला कि वे ऐसी स्थितियों में की जाने वाली प्रक्रिया से पूर्णतया अवगत हो गए और वे इसके प्रति भी पूर्ण आश्वस्त है कि मुझे उचित मुआवजा मिलेगा। साथ ही वे यह भी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से जुड़े रहने पर मुझे एक ओर जहाँ शासन की मनःस्थिति से अवगत होने का अवसर मिलेगा वहीं यह जानने का भी कि कितनी क्षति पर कितनी राहत देय होती है? इसके बिल्कुल अलग महाराज सिंह प्रक्रिया विशेषज्ञ के रूप में अपने भाइयों और समाज को परामर्श देने का भी कार्य कर सकने में सक्षम होंगे। यदि समाज महाराज सिंह की जागरूकता का संज्ञान ले थोड़ा-सा भी जागरूक हो सके, तो काफी हद तक आत्मनिर्भर हो सकता है। साक्षरता व जागरूकता दो बिल्कुल भिन्न चीजें है। साक्षर होने से यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि जो साक्षर है वह जागरूक भी है। जागरूकता बिल्कुल भिन्न स्थिति है और यह वर्ग या समाज के संवेदनशीलता की प्रतीक होती है। आइए! आज यह सामूहिक प्रण लेते हैं कि यदि हम साक्षर हैं तो समाज के जागरूक नागरिक भी अवश्य बनेंगे और यह भी जानने का भरपूर प्रयास करेंगे कि कौन हमारे प्रेरक बन सकते हैं?
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