कृत्रिमता या मिलावट को यदि एक मानकर समझने का प्रयास करें तो इस क्षेत्र में हुई प्रगति विस्मित करने वाली है। वर्तमान में औषधीय गुणों वाले समस्त खाद्य पदार्थों का स्थान बिना गुण वाली वैकल्पिक किस्मों ने ले लिया है। दुग्ध, घी समेत देशी गुणों वाले समस्त खाद्य ठिकाने लगा दिये जाने के बाद मानवीय और कृषिगत औषधियों का नंबर आया। अब प्रयास मानवीय भावनाओं को लेकर है। असंख्य टी.वी. श्रृंखलाओं समेत ओ.टी. टी. और फिल्मों में अब भावनाओं का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि धीरे धीरे ही सही पर मजबूत तरीके से कृत्रिमता में भी कृत्रिमता ने प्रवेश कर लिया है। भावुक दृश्यों पर भी दर्शक भावुक नहीं हो पाता। कुछ भी समझ नहीं आता कि हम जा किधर रहे हैं। कोई नहीं चलते जाओ धीरे-धीरे।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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