यह जीवन बड़ा रुचिकर है। वृद्धावस्था में पदार्पण के उपरांत यह अहसास हुआ कि आयु किस प्रकार अपने घेरे में लेती जाती है, वित्तीय सीमिततायें होती जाती हैं और हमको युवावस्था में लिए गए निर्णयों की समीक्षा करने के लिए प्राकृतिक रूप से बाध्य भी करती है। मेरा युवा काल यद्यपि बेहद संयमित रहा, लेकिन मैं युवावस्था ही से समाज सेवा में संलग्न हो गया तो सबके लिए प्रयास करना मुझको प्राकृतिक रूप से भाने लगा। इस दौरान लेखन मेरा पैशन हो गया और कुदरत ने मुझको कुछ इस तरह मेरी मंशा के अनुरूप तैयार किया कि मुझको सदैव ही आत्मसंतोष हुआ।
मुझको अब बासठवें वर्ष में झड़ते दांतों को लेकर यह अहसास हुआ कि उनके स्वास्थ्य की कितनी अनदेखी हुई और यदि वह अनदेखी न हुई होती तो शायद इतनी जल्दी उनकी ऐसी दुर्दशा न होती। इस ही क्रम में मैंने अनेक अन्य मामलों को भी समझने का प्रयास किया तो पाया कि जब जब भी मैंने किसी असंगत प्रयास का प्रतिवाद किया तब तब ही मैं समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी कर पाया। इस ही क्रम में मैंने अनेक मौकों पर विविध प्रक्रियाओं में प्रचलित देयों को समझने का प्रयास किया। विशेष रूप से जब मुझको अपने टूटे दांतों की अनेक जड़ों को निकलवाने के लिए एक डेंटिस्ट से परामर्श करना पड़ा। अब दिलचस्प बात देखिए कि मुझको दातों की जड़ों को निकलवाना था तो डेंटिस्ट को बताया कि जड़ें निकलवानी हैं। इस हेतु मुझको कंसल्टेशन फी देनी पड़ी। लेकिन सब दे रहे थे तो मुझको भी देनी पड़ी। इसके अतिरिक्त प्रति दांत दर पांच सौ रुपए प्रति जड़। यह सेवा शुल्क अनावश्यक और अत्यधिक था, लेकिन सर्वस्वीकार्य था तो किसी प्रकार का प्रतिवाद संभव न था। मैंने बावजूद इसके अपनी बात कही तो मुझको तत्काल रियायत प्रति दांत दे दी गई।
एक समाजसेवी की डायरी से उद्धृत
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