इस आलेख का शीर्षक हम हिन्दुस्तानियों की मनःस्थिति का सटीक परिचायक है। यह हमारी विशिष्ट विशेषता है कि हम कहने में कभी भी नही चूकते हैं भले ही बात का बतंगड़ क्यों न बन जाए? मैं किशोरावस्था से ही एक ऐसे रिश्तेदार से परिचित था, मद्यपान कर किसी को भी कुछ कह देना जिसकी विशेषता थी। उसके द्वारा दिन में ही यह तय कर लिया जाता था कि आज 'किसको क्या कहना है'? और सायंकाल में
मद्यपान कर वह अपने मिशन को अंजाम दे दिया करता था। ऐसे में किसी के रुष्ट होकर टोक दिये जाने पर वह नशे को दोष दे दिया करता था। कह दिया करता था कि नशे कि मैंने क्या कर या कह दिया मुझे कुछ नहीं पता? उसके कथन में कितनी सच्चाई होती होगी यह तो वही जाने परन्तु यदि स्वदेशी सामाजिक परिवेश का आकलन करें तो पाएँगे कि कुछ भी कहने के मूल में हमारी कोई मंशा अवश्य निहित रहती है। और भी कुछ नहीं तो नीचा ही दिखाने की, जबकि अनेक अवसरों पर ऐसा भी हो जाता है कि कुछ लोगों को अपने कथन के लिए स्वयं ही नीचा देखना पड़ जाता है।
आइए अब एक और उदाहरण का संज्ञान लेते हैं। मेरा एक निकटस्थ अपनी ससुराल गया। ससुराल जाकर उसने जब अपनी गाड़ी की डिग्गी से सामान उतारा तो उसकी सहायता
कर रहा एक रिश्तेदार भी उसके साथ था जिसने गाड़ी की डिग्गी में भूसे के कुछ तिनक पड़े देखकर कटाक्ष कर दिया कि क्या गाड़ी भूसा ढोने पर लगा दी थी। मेरा निकटस्थ एक अत्यन्त समझदार एवं संवेदनशील व्यक्ति है, परन्तु वह यह कटाक्ष सुनकर स्तब्ध रह गया। फिर भी मौन रहकर मेरे निकटस्थ ने समझदारी का परिचय दिया। घटनाक्रम की
समीक्षा करें तो पाएंगे कि न तो यह मजाक (मखौल) था और न ही वास्तविकता, परन्तु एक चुभता सा और असहज करने वाला एक चुभता हुआ कटाक्ष अवश्य था। इस घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू यह है कि मेरा निकटस्थ तो सम्मानित शासकीय सेवारत है जबकि कटाक्ष करने वाला एक परिपक्व आयु को प्राप्त व्यक्ति है। मेरा निकटस्थ तो बीती ताहि बिसार दे की तर्ज पर इस कटाक्ष को भूल गया पर उसने इसकी बाबत मुझे बता दिया तो मैं इस कटाक्ष का आशय तलाशने में जुट गया। मैंने पाया कि उपरोक्त कटाक्ष यद्यपि निरर्थक था, परंतु उसको कहने के पीछे निहित मंशा अवश्य कलुषित थी। ऐसा करने के पीछे प्रतिक्रिया जानना भी था अन्यथा तो भारवाहक वाहन में तो पर्याप्त भूसा आ भी जाए पर यात्री वाहक कार की डिग्गी में भूसा ढोया ही नहीं जा सकता। मेरा निकटस्थ व गाड़ीवाहक क्योंकि मितभाषी (कम बोलने वाला) था, सो उसने मौन रहना ही बेहतर समझा। बात भी आई-गई हो गई पर मेरे संज्ञान में ला दिये जाने पर आलेख का शीर्षक अवश्य बन गई। यह तो रही कहने की बात! इस से विलग कुछ करने की मंशा भी यदि पवित्र भाव से की जाए तो कुछ अद्भुत होने में विलंब नहीं होता।
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