अध्ययन के संदर्भित एक आम और गलत धारणा यह कि अध्ययन करने में लगने वाला समय सीखने की मात्रा के सीधे आनुपातिक होता है। प्रभावी अध्ययन केवल यह नहीं है कि आप कितने समय तक पढ़ते हैं? बल्कि यह भी है कि आप कैसे पढ़ते हैं? क्यों पढ़ते हैं? और पढ़कर क्या सीखते हैं? जानकारी को वास्तव में समझने और बनाए रखने के लिए केवल पाठ या नोट्स को पढ़ना और फिर से पढ़ना पर्याप्त नहीं हो सकता है। यह कहा जाता है कि अध्ययन उबाऊ और चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि आप हर क्षेत्र की सामग्री को अपने लिए प्रासंगिक और सार्थक बनाने के तरीके ढूंढते हैं तो यह दिलचस्प और आकर्षक भी हो सकता है तथा मार्गदर्शक भी। अध्ययन अर्थात् Study मार्गदर्शक भी हो सकती है। ज़रा इसे समझें कि एक दफा मेरे एक सहयोगी से भावी मुलाकात एक स्थान और समय को लेकर तय हो गई। उस स्थान पर पहुंचने से पूर्व मेरे एक परिजन से मेरी मेरे सहयोगी के संदर्भ में बात हुई।
और! उसी दौरान मार्ग से गुजरे मेरे सहयोगी ने मेरी कही बात का गलत भाव लेकर मिलने पर उस संदर्भ में मुझसे नाराजगी व्यक्त की।
तब अपने अध्ययन की जीवन में मेरे गुनने के अभ्यास के कारण मैंने उस घटनाक्रम का जब स्पष्टीकरण दिया तो मेरे सहयोगी की मनः स्थिति ठीक हो गई। यहां पर इस घटना के उल्लेख का आशय यह है कि अध्ययन आपको सही वस्तुस्थिति को सामने रखकर माहौल को हल्का करने में सक्षम करता है। दूसरों का आचार व्यवहार और उसके संदर्भ में समझ को विकसित करना भी अध्ययन ही का क्षेत्र है। हितों को साधना और ऐसे प्रयासों को समझना तथा उसको समझकर उस दिशा में प्रयास करना और उस ही तरह के प्रयासों को नियंत्रित कर सीमित कर देना भी। एक प्रतिष्ठित कंपनी के लिए काम करने के बाद डेढ़ महीने तक भी जब मेरी मेहनत का भुगतान न हुआ तब मुझको कहना ही पड़ा कि - "प्रभु पिछला महीना भुगतान हेतु तय था वह भी निकल गया। जरा ध्यान दें पिछले दिनों पर जब मेरे वेतन में से दो दिन का वेतन कट गया था तो कुछ न हुआ। और जब मेरे वेतन में कुछ राशि अधिक आ गई थी तो मेरे बताने के बाद उसकी वापसी के लिए कैसा प्रेशर बना था। और! अब तो खुला ऑफर था कि काम फ्री में करा लें या फिर हैंडसम भुगतान कर दें। अब यदि आपने भुगतान करा देने का निर्णय लिया था तो अब क्या वह सूक्ष्म राशि भी पंचवर्षीय योजना का हिस्सा बन जायेगी। संभव है आपको मेरी बातें गलत लग रही हों, लेकिन ऐसे समयबद्ध निर्णय कंपनी के हित में हैं।बाकी जैसी जिसकी भावना। निर्णय तो नवरत्नों ही का रहेगा।"
ऐसे वित्तीय मामलों में अक्सर चिढ़ाने बातें कही जाती हैं तो इसलिए कि चिढ़ने वाला उन मामलों से खुद को हटा लें चिढ़कर। और! अक्सर ऐसा होता भी है, लेकिन यह सब का सब अध्ययन का विषय है क्योंकि इस सबका अध्ययन करके ऐसी स्थितियों के मध्य मार्ग निकाले जा सकने संभव हैं। कहने का आशय यह है कि जीवन का अध्ययन कर जीवन में उत्पन्न होने वाली तमाम समस्याओं का निदान संभव है।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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