यह दिलचस्प है कि आकलन करने की क्षमता के सीमित होने से उसका परिणाम इस रूप में सामने आया है कि विश्व भर में हम विविध चीजों में भेद कर पाने में विफल रहने लगे हैं। उज्ज्वल और कलुषित मानसिकता को समझ पाना और अच्छे बुरे में भेद कर पाना अब जटिल हो गया है और किसी एक में नहीं हर क्षेत्र में, जबकि एक अच्छे कार्य का छोटा सा प्रयास भी महत्वपूर्ण होता है। ठीक ऐसे जैसे बूँद बूँद से घड़ा भरता है वैसे ही छोटे छोटे प्रयासों से सत्कार्यों को गति मिलती है. कहने का आशय सिर्फ इतना सा है कि बाधाओं की परवाह किये बगैर सत्कर्मों की दिशा में प्रयासों को जारी रखें. और! जीवन की अनिवार्यताओं को जानें- समझें और आत्मसात करें।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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