अधरों की मुस्कान
अधरों की मुस्कान मनोहर मन की पीड़ा हरती है।
पनपे द्वेष-भाव मानव के दूर पलों में करती है।
अन्तस में प्रवेश हेतु ही अधर बने पावन द्वारा।
अधरों की मुस्कानों से तो शत्रु भी खुद को हारा।
अलग अधर जब भी होते हैं शोभा थोड़ा घबराती।
लेकिन जब भी अधर मिले हैं प्रेम अनूठा ये उपजाती।
अधरों से निकली बोली ही प्रेम व घृणा भरती है।
पनपे द्वेष-भाव मानव के दूर पलों में करती है ।।१॥
तन में जो भी दो इन्द्री हैं नहीं कभी भी मिल पातीं।
संग कान के आँख नाक भी सदा मिलन को ललचातीं।
मात्र अधर का मिलन सदा ही हर सपना साकार करे।
खुलकर मीठे बोल परोसे मिले परस्पर प्यार भरे।
अधरों की मधुरिम बोली से भक्त भावना झरती है।
पनपे द्वेष-भाव मानव के दूर पलों में करती है ।। २॥
अधरों का निर्माण विधि ने किया प्रेम बरसाने को।
नहीं किया मानव जाति को आपस में भिड़ जाने को।
बैर वैमनस्य झगड़ा आदि अधरों से ही होता है।
जिसे पालकर अधरों से ही दिखता मानव रोता है।
मानव तड़प-तड़प जाता मुस्कान अधर जब भरती है।
पनपे द्वेष-भाव मानव के दूर पलों में करती है ।।३॥
कुदरत वाले अधर सजीले नये चलन ने रँग डाले।
लाल गुलाबी रंग हजारों ने हैं बदल ढंग डाले!
अधरों को रंग लो कितना ही बिन मुस्कान अधूरे हैं।
जिस घर में मुस्कान बिखरती मात्र वो ही घर पूरे हैं।
आज अधर की मुस्कानों को तरस रही यह धरती है।
पनपे द्वेष-भाव मानव के दूर पलों में करती है ।।४॥
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण', देहरादून
समाचार पत्र 'उलझन सुलझन' की प्रस्तुति
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