सुधि पाठक वर्ग के समक्ष हमारा प्रथम अंक प्रस्तुत है और एक आग्रह भी कि इस अंक को दृष्टिगत रखकर हमारी समीक्षा न करें। संयम के साथ विषय-वस्तु का भाव कुछ अंकों में समझने का प्रयास करें।
और! यह भी समझें कि यह जीवन एक तिलस्मी यन्त्रावली सरीखा है जिसकी कुंजी हमारे परिश्रम में ही निहित है। यन्त्रावली में बहुत सारे पुर्जे एक ही साथ क्रियाशील होकर कार्य को अंजाम तक पहुँचाते हैं। प्रभु ने सभी को मन-मस्तिष्क समरूप दिया है, परन्तु मस्तिष्क से इतर प्रयासों से और एकत्रित सूचनाओं से मन-मस्तिष्क की विचार-शक्ति की धार पैनी और पैनी होती जाती है।
मानव मस्तिष्क की संरचना एक समान होने के बावजूद इस जैसे प्रयासों से बौद्धिक क्षमता में पर्याप्त भिन्नता दृष्टिगत होने लगती है। इस भिन्नता के बावजूद भी यदि हम
“करत करत अभ्यास के, जड़मति होता सुजान।”
को चरितार्थ करते हुए अपने जीवन को दिशा देने की ठान लें तो कोई सूरत नहीं कि सफल न हों। और क्षेत्र कोई भी हो। यदि हम अपने-अपने जन्मदिन को ही ‘संकल्प दिवस'मान लें और अगले जन्मदिवस तक के लिए कोई प्रण कर लें तो अनंत सुधार कर सकने में सक्षम हो सकते हैं। इसके लिए जागरूकता एक अति आवश्यक उपागम है। जागरूकता जैसा यह उपागम तरक्की का अत्यधिक सीधा और सरल माध्यम है। जीवन में छोटे-छोटे लक्ष्य तय कर जागरूकता उनकी प्राप्ति में सहायक हो सकती है। छोटे-छोटे लक्ष्य तयकर एक बड़े अनन्तिम लक्ष्य के अनुसार ही प्राप्त की जा सकती है। दृढ़संकल्प के साथ प्रयास करें, सटीक तरीके से सोचें और सकारात्मकता के साथ बदलाव की दिशा में प्रयास करें। सफलता तत्काल सामने दिखेगी। किसी यंत्रावली को उपयुक्ततम गति से प्रचालित करने के लिए समग्र भाव से प्रयासों की जरूरत होती है। जागरूकता के द्वारा ही ऐसे मकड़जालों से हम स्वयं को बचा सकते हैं कि
एक ग्राम के सीधे-साधे अठ्ठारह बच्चों को
एक व्यक्ति बहला फुसलाकर एक कस्बे में
ले गया यह कहकर कि वहाँ पर आधार
कार्ड अच्छे बनते हैं, जबकि वहाँ पर फर्जी
बने और वे बालक वर्तमान में न्यायिक प्रक्रिया
के शिकंजे में हैं।
जब तब समाज में ऐसी घटनाएँ सामने आती ही रहती हैं, हमको स्वयं कोई सामना करने में सक्षम करना है।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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