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असमंजस

आम लोगों की जिंदगी को किस प्रकार आसान बनाया जाए एवं दूरदराज इलाकों में रहने वाले व्यक्तियों को भी सभी प्रकार की सुविधाएं आसानी से मिल सकें ऐसे प्रयासों के निरंतर चलते विश्व भर में बदलाव बेहद तीव्र गति से आया है और समाज में आलस्य व्याप्त हुआ है। विविध कारणों से  विश्व भर में बना  आलस्य का वातावरण उसका साक्षात प्रतीक इसलिए प्रतीत होता है क्योंकि भारत ही नहीं विश्व भर में मानव संसाधनों के माध्यम से सम्पन्न होने वाले विविध कार्यों में उनकी सहभागिता में अत्यधिक कमी आई है। इस परिप्रेक्ष्य मैं यहाँ एक ऐसी घटना का जिक्र करना उपयुक्त समझता हूँ‚ जो मेरा विश्वास है कि मानव मन कि स्थिति को बहुत कुछ स्पष्ट कर देगी।

एक बार मेरे घर पर हर्षोल्लास संबंधी एक आयोजन कुछ धार्मिक लक्ष्यों के साथ प्रस्तावित था। उसमें तकरीबन सौ सवा सौ लोगों का इंतजाम था। सम्मिलित होने वाले सभी लोगों के भोजन की भी व्यवस्था थी और किसी भी आगंतुक को किसी भी स्तर पर असुविधा का सामना ना करना पड़े तो उस हेतु कुछ वैतनिक सहायकों का भी विविध उद्देश्यों से प्रबंध किया गया था। उन वैतनिक सहायकों में से एक अत्यंत अस्थिर मना और कामचोर भी था। उसका किसी भी काम में मन ना लग रहा था। उसको जो भी काम बताया जाता उस काम में वह बस पल भर के लिए ही लगता और तत्काल ही किसी दूसरे चल रहे काम में खुदबाखुद लग जाता या फिर व्यवधान उत्पन्न करने लगता यानि हमारे लिए वह परेशानी का सबब बन गया। उसका इंतजाम सुविधा के ध्येय से किया गया था, लेकिन सुविधा के स्थान पर स्वयं वह एक उलझन का रूप ले चुका था। हमारा हलवाई नियमित है और  हमारा हितैषी भी है तथा हमारे यहाँ नियुक्त वह वैतनिक सहयोगी उस हलवाई के पास भी कई चक्कर लगा चुका था। ऐसे में मैंने अपनी व्यथा हलवाई से कही तो उसने तत्काल उसको अपने कार्य में लगाकर समस्या का निदान कर दिया और उसके विकल्प रूप में हमको अपना एक सहायक दे दिया।

इस सब से स्पष्ट होता है कि जीवन को निरंतर आसान बनाने की प्रक्रिया जारी रहने से जनमानस अस्थिर मना होता जा रहा है। इसका दुष्प्रभाव आलस्य के रूप में सामने आ रहा है। इस स्थिति का सामना रोजगारपरक सामाजिक यंत्रावली का महत्वपूर्ण अंग बनके ही किया जा सकना संभव है। जिस पत्रिका में आप इस सब को पढ़ रहे हैं उसकी तैयारी में विविध स्तरों पर कार्य किया जाता है‚ लेकिन एक यंत्रावली के रूप में विविध पुर्जों के द्वारा  कार्यों को एकीकृत करके उसको मूर्त रूप दिया जा सकना संभव हो पाता है।

आइये दिये से दिया जलाने का प्रयास करते हुए एक प्रण अपने अपने दायित्वों को निभाने की दिशा में करते हैं कि कम۔से۔कम हम अपने अपने स्तर से इस आलस्य को अपने पास फटकने नहीं देंगे और इस पत्रिका को मूर्त रूप दिये जाने कि प्रक्रिया में अपनी चेतनता को बरकरार रख लिया जा पाता है उसी प्रकार से आम जनजीवन में भी प्रयास जारी रहेंगे।

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